मधु-श्रावणी हैं मिथिला में नव वर-वधु का पर्व

मिथिलांचल में , मैथिल ब्राम्हण परिवार कि नव-विबाहित कन्यायें अपने पति के साथ मधुश्रावणी पर्व मनाती हैं | इस दिन नव विवाहित दम्पति एकसाथ नाग देवता कि पूजा करते हैं | १३ दिन का यह अनुष्ठान श्रावण माह के पहले पखवाड़े के पंचमी तिथि से लेकर द्वितीय पखवाड़े के तृतीया तिथि तक मनाई जाती है |

क्या किया जाता है इस दिन ?

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नव विवाहित कन्या १२ दिन तक यह अनुष्ठान करती है | जबकि  १३ वें दिन जिसे मधुश्रावणी का दिन भी कहा जाता है ,  वह कन्या अपने पति के साथ यह अनुष्ठान करती हैं |

मधुश्रावणी के दिन से ही नव-विवाहित लडकियां सांसारिक जीवन में प्रवेश करती है |

प्रतिदिन करतें है फूलों का संग्रह !

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ये लड़कियाँ , दुल्हन के कपड़े में प्रथम दिन से लेकर १२ दिनों तक अपनी सहेलियों के साथ बगीचे में जाती हैं और मौसमी फूलों , बांस एवं अन्य पेड़ कि पत्तियों को संग्रह कर बॉस कि बनी हुई टोकड़ी में सजाकर रखती हैं |

शिव-गौरी के साथ नाग की पूजा

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नवव्याहताएँ नाग देवता एवं भगवान् शिव- गौरी की पूजा प्रतिदिन करती हैं | बुजुर्ग महिला १२ दिनों तक मधुश्रावणी कि कथा सुनाती हैं |

ये कथाएं धार्मिक उपाख्यानों से भरी परी हैं जो इन लड़कियों को अपने-अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित होना सिखाती है |

मॉडर्न-क्लासिक मैथिलि साहित्य की 5 बड़ी हस्तियाँ

सन १८३० के बाद का दौर मॉडर्न मैथिलि लिटरेचर की शुरुआत मानी जा सकती है | इस अंतराल में मैथिलि साहित्य जगत में अनेको मैथिलि साहित्य रत्न पैदा हुए जिनमे बिनोद बिहारी वर्मा , सुरेन्द्र झा सुमन आदि थे | आईये जानते हैं कुछ बेहद चर्चित क्लासिक और मॉडर्न डे मैथिलि साहित्यकारों के बारे में |

राजकमल चौधरी

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राजकमल चौधरी एक प्रसिद्ध कवि, लेखक , उपन्यासकार , आलोचक एवं विचारक थे | साहित्य में ‘  हट कर  ’  सोचने वाले प्रयोगकर्मी राजकमल का वास्तविक नाम मनीन्द्र नारायण चौधरी था |

उन्होंने हिंदी , मैथिली एवं बांग्ला भाषा में अनेको रचना लिखी |  मधेपुरा जिले  में मुरलीगंज के पास रामपुर हवेली नामक गाँव में  जन्मे (१९२९) राजकमल का बचपन बहुत सामान्य नहीं रहा था | बाल्यावस्था में उनकी माँ को खो देना  और  उसके बाद पिता द्वारा दूसरी शादी कर लेने जैसे घटनाओ का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा|  स्नातक करने के बाद उन्होंने पटना सचिवालय में शिक्षा विभाग में नौकरी के साथ साथ अपनी लेखनी की शुरुआत अपनी मातृभाषा से कर दी |

‘ अपराजिता ‘  से अपनी लेखन यात्रा शुरू करने वाले राजकमल ने  कहानियों के माध्यम से ग्रामीण समाज में फैली हुई रुढ़िवादी ढाँचे पर गहरा प्रहार किया | उन्होंने मैथिलि कविता संग्रह ‘स्वरगंधा’  समेत लगभग १०० कविता ,  ३७ कहानियां और कई एकांकी एवं आलोचनात्मक लेख लिखे | उनकी सबसे चर्चित रचनाओ में से एक हैं  मैथिली कहानियों का प्रथम संग्रह ‘ ललकापाग ’ जिस पर हाल के वर्षों में एक फिल्म भी बन चुकी है | “ ‘चम्पाकली’ , एकटा  विषधर “   में उन्होंने बेमेल विवाह   |

अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों के शोषण का विरोध किया है जो उस दौर के लिहाज से उन्हें सबसे परिस्कृत सोच वाला लेखक बनाता है |

नागार्जुन

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मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में जन्मे (१९११)  नागार्जुन   मूल रूप से दरभंगा जिलान्तर्गत तरौनी गाँव के रहने वाले थे | हिंदी , मैथिली एवं संस्कृत भाषा में अनेकों पुस्तक लिखने वाले नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था | वे हिन्दी में वे नागार्जुन के नाम से रचना लिखते थे जबकि मैथिली  में यात्री के नाम से |

राहूल सान्क्रित्यायन के द्वारा अनुवादित पुस्तक “संयुक्त निकाय” पढ़ कर उनकी इच्छा इसकी मूल पुस्तक जो पाली भाषा में लिखी गयी थी पढ़ने की हुई | इसके लिए वे श्रीलंका चले गए और वहां एक मठ में भिक्षुओं को संस्कृत पढ़ाने लगे | यहीं पर वैद्यनाथ मिश्र ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिए | मैथिली में उनकी एक ऐतिहासिक रचना ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें १९६९ ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया |

अलावा उन्होंने मैथिली में ‘ पारो और नवतुरिया’ उपन्यास भी लिखा जो काफी प्रसिद्ध हुआ | संस्कृत में इनके द्वारा लिखित काव्य पुस्तक ‘धर्मलोक शतकम’ लिखी गयी | हिंदी में कई पुस्तकों , काव्यों के अलावा बाल साहित्य लिखे जिसमे कथा मंजरी भाग १ , कथा मंजरी भाग २ , मार्यादा पुरुषोत्तम एवं विद्यापति की कहानियां प्रमुख है |

 

हरिमोहन झा

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मैथिली साहित्य जगत में हरिमोहन झा का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है | जिस तरह प्राचीन काल में विद्यापति ने मैथिली कविता को जिस उत्कर्ष पर पहुंचाया | उसी तरह से हरिमोहन झा ने मैथिली गद्य को उसी उंचाई पर पहुंचा दिया | इन्होंने हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली में सामाजिक -धार्मिक रूढ़ि , अंधविश्वास एवं पाखंड पर करारा चोट पहुंचाया है |

हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली को अपनी लेखनी का हथियार बनाते हुए सामाजिक -धार्मिक रूढ़ि , अंधविश्वास एवं पाखंड पर करारी चोट करने वाले हरिमोहन झा को मैथिली गद्य को नयी उचाईयों तक ले जाने का श्रेय प्राप्त है | मैथिली साहित्य जगत के इस बेहद अहम् लेखक का जन्म १९०८ ई०   वैशाली जिलान्तर्गत कुमर वाजितपुर ग्राम में हुआ था |

हरिमोहन झा  को १९८५ ई० में मृत्योपरांत  “ जीवन यात्रा ”  पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारदिया गया |

इन्होने सर्व प्रथम १९३३ ई० में कन्यादान उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने मैथिल समाज में महिलाओं की स्थिति को दिखाया था  की  किस तरह मैथिल औरतें अंधविश्वास और पाखंड की जकड़ में फँसी हुई थी | ‘द्विरागमन’  महिलाओं के की जीवन शैली पर आधारित थी | १९४८ में इनकी अगली पुस्तक ‘ खट्टर कक्का के तरंग’ आई जो बहुत ही प्रचलित हुयी  |

हरिमोहन झा द्वारा रचित ‘ ग्रेजुएट पुतोहू ’ और ‘ बाबाक संस्कार मैथिलि साहित्य जगत की मास्टर पीस कृतियाँ हैं |

 

उषा किरण खान

Read more: मॉडर्न-क्लासिक मैथिलि साहित्य की 5 बड़ी हस्तियाँउषा किरन खान हिदी और मैथिली  की एक प्रतिष्ठित लेखिका और सेवानिवृत इतिहासकार हैं |१९४५ ई०  में  दरभंगा में जन्मी  उषा किरन खान  की लेखनी नागार्जुन से बहुत प्रभावित है|

‘ उषा किरण ’ के अनुसार  ,  “  नागार्जुन  मेरे पिता के सामान हैं  और उनके लिखने की   शैली  से बहुत ही प्रभावित हूँ ! “  उषा किरन खान को उनकी मैथिली में प्रसिद्ध उपन्यास ‘ भामती ’ और एक ‘ अविस्मरनीय आत्मकथा ’के लिए २०११ ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला |

खान को २०१५ ई० में पद्मश्री अवार्ड भी उनके द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में की गयी सेवा के लिए भी मिला | “हिदी सेवी सम्मान” , “महादेवी वर्मा पुरस्कार”तथा “राष्ट्रकवि दिनकर पुरस्कार”  आदि अनेको पुरस्कारों से सम्मानित से उषा किरण वर्तमान में वे सामाजिक एवं सास्कृतिक कार्यों में संलिप्त हैं |

 

डा० शेफालिका वर्मा

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डा० शेफालिका वर्मा को ‘ मैथिली की महादेवी’  माना जाता है | मैथिली साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें २०१२ ई० साहित्य अकादमी अवार्ड के लिए चुना गया  |  अपनी आत्म कथा पर आधारित  इस पुस्तक ‘ क़िस्त क़िस्त जीवन’  के माध्यम से डा० वर्मा ने समाज में फैली बुराइयों और पिछड़ेपन  पर प्रकाश डाला था |

शेफालिका वर्मा का जन्म मधेपुरा विद्यापुरी मोहल्ला में हुआ था | बचपन से ही साहित्य में रूचि इस लेखिका ने दर्जनों उपन्यास और पुस्तके लिखी हैं | पटना के  ए० एन० कालेज  के स्नातकोत्तर हिदी विभाग से अवकाश प्राप्त कर बर्तमान समय में दिल्ली में रहकर साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं |

इसलिए इतनी महवपूर्ण हैं अभीष्टफल दायिनी महाशिवरात्रि

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शिवरात्रि शिव को बहुत ही प्रिय है जिस कारण इसे शिव रात्रि कहा जता है | इस दिन महादेव करोड़ों सूर्य के सामान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए  | सर्वप्रथम भगवान विष्णु और ब्रम्हा ने इस लिंग की पूजा की थी | इसलिए महाशिवरात्रि को भगवन भोले शंकर की जन्म दिन के रूप में जानते हैं |

कई स्थानों पर यह भी माना जाता है कि इसी दिन भगवान् शिव का विवाह हुआ था | शिवरात्रि व्रत प्राचीन काल से ही प्रचलित है | हिन्दू पुराणों में हमें शिवरात्रि व्रत का उल्लेख मिलता है , देवी लक्ष्मी , इन्द्रानी , सरस्वती , गायत्री , सावित्री , सीता , पार्वती , और रति ने भी शिवरात्रि  का व्रत किया था |

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी की तिथि में चन्द्रमा सूर्य के बहुत ही नजदीक होता है | इस प्रकार जीवन रूपी चंद्रमा का शिव रूपी सूर्य के साथ मिलन होता है | अतः इस चतुर्दशी को शिव पूजा करने से लोगों को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है | यही शिवरात्रि का महत्व है |

शिव पार्वती का विवाह

पुराणों के अनुसार महाशिवरात्रि ही वह दिन है जब भगवान शिव ने  पार्वती से विबाह रचाया था |

शिवरात्रि व्रत की महिमा

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इस व्रत के बारे में कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है ,  वह सभी भोगों को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्ति होती है | महा शिवरात्रि के दिन भगवान् शिव मानव जाति के नजदीक आ जाते हैं |मध्य रात्रि में शिव मनुष्य के सबसे निकट रहते हैं इस कारण लोग रातभर जागते रहते हैं |

इस व्रत को करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं | १४ वर्ष लगातार व्रत करने के बाद इसका उद्यापन कर देना चाहिए |

महिलाओं के लिए महाशिवरात्रि व्रत का महत्व

महिलाओं के लिए महाशिवरात्रि का बड़ा ही महत्व है | अविवाहित महिलायें भगवान् शिव से प्रार्थना करती हैं कि उन्हें शिव जैसा ही पति मिले | जबकि विवाहित महिलायें अपने पति और परिवार के लिए मंगल कामना करती हैं | महाशिवरात्रि के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं | इसके महत्व को  समझने  के लिए पौराणिक कथाओं को जानना होगा |

गरुड़ पुराण में कथा

सुन्दरसेनक निषादों का राजा था जो आबू पर्बत पर रहता था | एक दिन वह अपने कुत्तों के साथ शिकार खेलने गया | लेकिन उसे कोई शिकार नहीं मिला | भूख प्यास से व्याकुल होकर वह घने जंगल में एक तालाब के किनारे बैठा  रहा |

पेड़ के किनारे एक बेल का पेड़ था जिसके नीच एक शिवलिंग भी था | शिवलिंग बेल पत्रों से ढका हुआ था | अपने शरीर को आराम देने के लिए अनजाने में शिवलिंग पर से बेल पत्रों को हटा दिया | तालाब से जल लाकर उसने अपना पैर धोया | जिससे जल की कुछ बूंद शिवलिंग पर भी पड़ी  |

उसका एक तीर भी शिवलिंग पर गिरा जिसे उठाने के क्रम में उसके हाथों से शिवलिंग का स्पर्श भी हुआ | इस प्रकार अनजाने में ही उसने शिवलिंग को नहलाया , छूआ और उसकी पूजा की |इसके बाद दुसरे दिन वह घर वापस लौट आया  और  भोजन किया |

जब उसकी मृत्यु हुई तो यमदूत उसे पकड़ कर यमलोक ले जाने लगे | लेकिन शिव दूतों ने यमदूतों को रोका | उनसे युद्ध कर उन्होंने सुन्दरसेनक को छुड़ाया |

अनजाने में ही पूजा करने के कारण वह पाप मुक्त हो गया | तबसे वह  शिव का सेवक बन गया पुन्य फल को प्राप्त किया |ऐसे में  कोई भी व्यक्ति ज्ञान में शिव की पूजा पाठ करे तो वह अवश्य ही पुन्य का भागी बनता है |

शिवरात्रि के ही दिन हुआ था समुद्र मंथन

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सभी पौराणिक कथाओं में नीलकंठ की कहानी ज्यादा प्रचलित है | मान्यता है कि शिवरात्रि के ही दिन समुद्र मंथन हुआ था |

उसी क्रम में समुद्र से कालकेतु विष निकला था | विष के ताप से पूरा संसार जलने लगा था | भगवान् शिव ने पूरे ब्रम्हांड की रक्षा के लिए स्वयं ही सारा विष पी लिया था | जिसके परिणामस्वरूप उनका गला नीला  हो गया और वे नीलकंठ कहलाये |

स्कन्द पुराण में कथा

कहते हैं चंड नामक एक दुष्ट व्यक्ति था | उसकी पत्नी भी दुष्ट थी | वह मछली पकड़ने का काम करता था |साथ ही वह बहुत से पशु पक्षियों का भी शिकार करता था | एक दिन वह एक पात्र में जल लेकर एक बेल की वृक्ष पर बनैले शुगर का शिकार करने के लिए चढ़ गया |

बनैले शुगर की प्रतीक्षा में वह पेड़ पर रात भर जागता रहा और बेल तोड़-तोड़ कर नीचे फेकने लगा | पेड़ के नीचे शिवलिंग था | उस पर भी  बेल पत्र गिरा | पात्र के जल से उसने मुंह धोया तो जल नीचे शिवलिंग पर भी गिरा | इस प्रकार उसने सभी तरह से शिव की पूजा की और रात भर पेड़ पर जागता रहा , और कुछ नहीं खाया | फिर सुबह होने पर वह पुनः नदी में मछली पकड़ने चला गया | रात में घर नहीं जाने कारण उसकी पत्नी भी भूखे पेट सो गयी | सुबह होने पर पति के लिए भोजन लेकर वह चली | पति को नदी किनारे देख कर वह भोजन को नदी तट पर रख कर नदी पार करने लगी |

दोनों ने नदी में स्नान किया और भोजन करने हेतु चले | लेकिन इतने देर में उनका भोजन एक कुता चट कर गया | पत्नी ने कुत्ते को मारना चाहा , लेकिन पति ने ऐसा करने से मना कर दिया | उनका हृदय पसीज गया था |तब शिवदूत शिवपुरी से उस पति पत्नी को लेने के लिए आ गए | क्योंकि उन्होंने अनजाने में ही शिव की पूजा कर ली थी |

क्यों वर्जित होतें हैं शुभ कार्य खरमास काल में

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हिन्दू पंचांग एवं वैदिक ज्योतिष की गणना के अनुसार एक ही राशि में एक महीना तक सूर्य का रहना अर्थात जब सूर्य के १२ राशियों का भ्रमण करते हुए वृहस्पति , धनु और मीन राशियों में पहुँचते हैं तो इस दिन से अगले ३० दिनों की समय को खरमास कहा जाता है |

ख़ास कर उत्तर भारत के लोग खरमास का पालन करते हैं | झारखंड , उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग खरमास महीना का अनुपालन करते हैं | भारत के पूर्वी , दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्रों के लोग खरमास को नहीं मानते हैं | दक्षिण भारत के पंचांग के अनुसार इसे मर्गझी महीना कहते हैं | जो अध्यात्मिकता सम्बन्धी वस्तुओं के लिए काफी फायदेमंद होता है |

ऐसे कार्य हैं वर्जित

ऐसी मान्यता है कि खरमास के दिनों में शुभ कार्य अर्थात इन दिनों में मांगलिक कार्य , उपनयन , मुंडन , भवन निर्माण , नया निवेश या व्यवसाय शुरू  करना , नयी जमीन - जायदाद खरीदना अशुभ माना गया है |अतः यह कार्य नहीं करना चाहिए |

तो क्या करें इस काल में ?

खरमास के दिनों में सिर्फ भगवत भजन , पूजा पाठ ही किया जाता है | खरमास के दिनों में पूजा-पाठ , यग्य , हवन एवं अनुष्ठान करना , गरीब लोगों को दान देना , भोजन कराना , वस्त्र दान करना शुभ माना गया है |

दो बार आता है खरमास

साल में दो बार खरमास आता है | खरमास के दौरान पृथ्वी से सूर्य तक  की दूरी सबसे अधिक होती है|  खरमास के दौरान सूर्य का रथ घोड़े के स्थान पर गधे का हो जाता है | इन गधों को ही खर कहा जाता है | अतः इसे खरमास कहा जाता है | जब सूर्य वृश्चिक राशि में से धनु राशि में जाता है तो  यह धनु की संक्रांति कहलाता है | जिसे मलमास भी कहा जाता है |

क्या कहती है मान्यताएं

खरमास के दिनों  में लोगों को सामूहिक रूप से रामायण कथा और भगवत कथा सुनना चाहिए | भागवत पुराण के आनुसार जिस व्यक्ति की मृत्यु खरमास अर्थात पौष माह में होता है तो वह नरक का भागी बनता है |

इस बात की पुष्टि माहाभारत से होती है कि जब अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में वाणों से मारा था तो वह समय भी खरमास ही था | इसलिए सैकड़ों बानों से घायल होने बावजूद भी भीष्म पितामह ने प्राण नहीं त्यागे थे | क्योंकि  यदि वे खरमास में प्राण त्यागते तो उनका अगला जन्म नर्क में ही होता |

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