क्यों वर्जित होतें हैं शुभ कार्य खरमास काल में

Kharmas is observed in Mithila twice a year

हिन्दू पंचांग एवं वैदिक ज्योतिष की गणना के अनुसार एक ही राशि में एक महीना तक सूर्य का रहना अर्थात जब सूर्य के १२ राशियों का भ्रमण करते हुए वृहस्पति , धनु और मीन राशियों में पहुँचते हैं तो इस दिन से अगले ३० दिनों की समय को खरमास कहा जाता है |

ख़ास कर उत्तर भारत के लोग खरमास का पालन करते हैं | झारखंड , उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग खरमास महीना का अनुपालन करते हैं | भारत के पूर्वी , दक्षिणी और पश्चिमी क्षेत्रों के लोग खरमास को नहीं मानते हैं | दक्षिण भारत के पंचांग के अनुसार इसे मर्गझी महीना कहते हैं | जो अध्यात्मिकता सम्बन्धी वस्तुओं के लिए काफी फायदेमंद होता है |

ऐसे कार्य हैं वर्जित

ऐसी मान्यता है कि खरमास के दिनों में शुभ कार्य अर्थात इन दिनों में मांगलिक कार्य , उपनयन , मुंडन , भवन निर्माण , नया निवेश या व्यवसाय शुरू  करना , नयी जमीन - जायदाद खरीदना अशुभ माना गया है |अतः यह कार्य नहीं करना चाहिए |

तो क्या करें इस काल में ?

खरमास के दिनों में सिर्फ भगवत भजन , पूजा पाठ ही किया जाता है | खरमास के दिनों में पूजा-पाठ , यग्य , हवन एवं अनुष्ठान करना , गरीब लोगों को दान देना , भोजन कराना , वस्त्र दान करना शुभ माना गया है |

दो बार आता है खरमास

साल में दो बार खरमास आता है | खरमास के दौरान पृथ्वी से सूर्य तक  की दूरी सबसे अधिक होती है|  खरमास के दौरान सूर्य का रथ घोड़े के स्थान पर गधे का हो जाता है | इन गधों को ही खर कहा जाता है | अतः इसे खरमास कहा जाता है | जब सूर्य वृश्चिक राशि में से धनु राशि में जाता है तो  यह धनु की संक्रांति कहलाता है | जिसे मलमास भी कहा जाता है |

क्या कहती है मान्यताएं

खरमास के दिनों  में लोगों को सामूहिक रूप से रामायण कथा और भगवत कथा सुनना चाहिए | भागवत पुराण के आनुसार जिस व्यक्ति की मृत्यु खरमास अर्थात पौष माह में होता है तो वह नरक का भागी बनता है |

इस बात की पुष्टि माहाभारत से होती है कि जब अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में वाणों से मारा था तो वह समय भी खरमास ही था | इसलिए सैकड़ों बानों से घायल होने बावजूद भी भीष्म पितामह ने प्राण नहीं त्यागे थे | क्योंकि  यदि वे खरमास में प्राण त्यागते तो उनका अगला जन्म नर्क में ही होता |

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