मॉडर्न-क्लासिक मैथिलि साहित्य की 5 बड़ी हस्तियाँ

आलेख


सन १८३० के बाद का दौर मॉडर्न मैथिलि लिटरेचर की शुरुआत मानी जा सकती है | इस अंतराल में मैथिलि साहित्य जगत में अनेको मैथिलि साहित्य रत्न पैदा हुए जिनमे बिनोद बिहारी वर्मा , सुरेन्द्र झा सुमन आदि थे | आईये जानते हैं कुछ बेहद चर्चित क्लासिक और मॉडर्न डे मैथिलि साहित्यकारों के बारे में |

राजकमल चौधरी

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राजकमल चौधरी एक प्रसिद्ध कवि, लेखक , उपन्यासकार , आलोचक एवं विचारक थे | साहित्य में ‘  हट कर  ’  सोचने वाले प्रयोगकर्मी राजकमल का वास्तविक नाम मनीन्द्र नारायण चौधरी था |

उन्होंने हिंदी , मैथिली एवं बांग्ला भाषा में अनेको रचना लिखी |  मधेपुरा जिले  में मुरलीगंज के पास रामपुर हवेली नामक गाँव में  जन्मे (१९२९) राजकमल का बचपन बहुत सामान्य नहीं रहा था | बाल्यावस्था में उनकी माँ को खो देना  और  उसके बाद पिता द्वारा दूसरी शादी कर लेने जैसे घटनाओ का उनपर गहरा प्रभाव पड़ा|  स्नातक करने के बाद उन्होंने पटना सचिवालय में शिक्षा विभाग में नौकरी के साथ साथ अपनी लेखनी की शुरुआत अपनी मातृभाषा से कर दी |

‘ अपराजिता ‘  से अपनी लेखन यात्रा शुरू करने वाले राजकमल ने  कहानियों के माध्यम से ग्रामीण समाज में फैली हुई रुढ़िवादी ढाँचे पर गहरा प्रहार किया | उन्होंने मैथिलि कविता संग्रह ‘स्वरगंधा’  समेत लगभग १०० कविता ,  ३७ कहानियां और कई एकांकी एवं आलोचनात्मक लेख लिखे | उनकी सबसे चर्चित रचनाओ में से एक हैं  मैथिली कहानियों का प्रथम संग्रह ‘ ललकापाग ’ जिस पर हाल के वर्षों में एक फिल्म भी बन चुकी है | “ ‘चम्पाकली’ , एकटा  विषधर “   में उन्होंने बेमेल विवाह   |

अपनी लेखनी के माध्यम से उन्होंने स्त्रियों के शोषण का विरोध किया है जो उस दौर के लिहाज से उन्हें सबसे परिस्कृत सोच वाला लेखक बनाता है |

नागार्जुन

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मधुबनी जिले के सतलखा गाँव में जन्मे (१९११)  नागार्जुन   मूल रूप से दरभंगा जिलान्तर्गत तरौनी गाँव के रहने वाले थे | हिंदी , मैथिली एवं संस्कृत भाषा में अनेकों पुस्तक लिखने वाले नागार्जुन का असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था | वे हिन्दी में वे नागार्जुन के नाम से रचना लिखते थे जबकि मैथिली  में यात्री के नाम से |

राहूल सान्क्रित्यायन के द्वारा अनुवादित पुस्तक “संयुक्त निकाय” पढ़ कर उनकी इच्छा इसकी मूल पुस्तक जो पाली भाषा में लिखी गयी थी पढ़ने की हुई | इसके लिए वे श्रीलंका चले गए और वहां एक मठ में भिक्षुओं को संस्कृत पढ़ाने लगे | यहीं पर वैद्यनाथ मिश्र ने बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिए | मैथिली में उनकी एक ऐतिहासिक रचना ‘पत्रहीन नग्न गाछ’ के लिए उन्हें १९६९ ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया |

अलावा उन्होंने मैथिली में ‘ पारो और नवतुरिया’ उपन्यास भी लिखा जो काफी प्रसिद्ध हुआ | संस्कृत में इनके द्वारा लिखित काव्य पुस्तक ‘धर्मलोक शतकम’ लिखी गयी | हिंदी में कई पुस्तकों , काव्यों के अलावा बाल साहित्य लिखे जिसमे कथा मंजरी भाग १ , कथा मंजरी भाग २ , मार्यादा पुरुषोत्तम एवं विद्यापति की कहानियां प्रमुख है |

 

हरिमोहन झा

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मैथिली साहित्य जगत में हरिमोहन झा का स्थान बहुत ही महत्वपूर्ण है | जिस तरह प्राचीन काल में विद्यापति ने मैथिली कविता को जिस उत्कर्ष पर पहुंचाया | उसी तरह से हरिमोहन झा ने मैथिली गद्य को उसी उंचाई पर पहुंचा दिया | इन्होंने हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली में सामाजिक -धार्मिक रूढ़ि , अंधविश्वास एवं पाखंड पर करारा चोट पहुंचाया है |

हास्य व्यंग्यपूर्ण शैली को अपनी लेखनी का हथियार बनाते हुए सामाजिक -धार्मिक रूढ़ि , अंधविश्वास एवं पाखंड पर करारी चोट करने वाले हरिमोहन झा को मैथिली गद्य को नयी उचाईयों तक ले जाने का श्रेय प्राप्त है | मैथिली साहित्य जगत के इस बेहद अहम् लेखक का जन्म १९०८ ई०   वैशाली जिलान्तर्गत कुमर वाजितपुर ग्राम में हुआ था |

हरिमोहन झा  को १९८५ ई० में मृत्योपरांत  “ जीवन यात्रा ”  पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कारदिया गया |

इन्होने सर्व प्रथम १९३३ ई० में कन्यादान उपन्यास लिखा जिसमें उन्होंने मैथिल समाज में महिलाओं की स्थिति को दिखाया था  की  किस तरह मैथिल औरतें अंधविश्वास और पाखंड की जकड़ में फँसी हुई थी | ‘द्विरागमन’  महिलाओं के की जीवन शैली पर आधारित थी | १९४८ में इनकी अगली पुस्तक ‘ खट्टर कक्का के तरंग’ आई जो बहुत ही प्रचलित हुयी  |

हरिमोहन झा द्वारा रचित ‘ ग्रेजुएट पुतोहू ’ और ‘ बाबाक संस्कार मैथिलि साहित्य जगत की मास्टर पीस कृतियाँ हैं |

 

उषा किरण खान

mithilas_greatest_writers_uउषा किरन खान हिदी और मैथिली  की एक प्रतिष्ठित लेखिका और सेवानिवृत इतिहासकार हैं |१९४५ ई०  में  दरभंगा में जन्मी  उषा किरन खान  की लेखनी नागार्जुन से बहुत प्रभावित है|

‘ उषा किरण ’ के अनुसार  ,  “  नागार्जुन  मेरे पिता के सामान हैं  और उनके लिखने की   शैली  से बहुत ही प्रभावित हूँ ! “  उषा किरन खान को उनकी मैथिली में प्रसिद्ध उपन्यास ‘ भामती ’ और एक ‘ अविस्मरनीय आत्मकथा ’के लिए २०११ ई० में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला |

खान को २०१५ ई० में पद्मश्री अवार्ड भी उनके द्वारा साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में की गयी सेवा के लिए भी मिला | “हिदी सेवी सम्मान” , “महादेवी वर्मा पुरस्कार”तथा “राष्ट्रकवि दिनकर पुरस्कार”  आदि अनेको पुरस्कारों से सम्मानित से उषा किरण वर्तमान में वे सामाजिक एवं सास्कृतिक कार्यों में संलिप्त हैं |

 

डा० शेफालिका वर्मा

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डा० शेफालिका वर्मा को ‘ मैथिली की महादेवी’  माना जाता है | मैथिली साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें २०१२ ई० साहित्य अकादमी अवार्ड के लिए चुना गया  |  अपनी आत्म कथा पर आधारित  इस पुस्तक ‘ क़िस्त क़िस्त जीवन’  के माध्यम से डा० वर्मा ने समाज में फैली बुराइयों और पिछड़ेपन  पर प्रकाश डाला था |

शेफालिका वर्मा का जन्म मधेपुरा विद्यापुरी मोहल्ला में हुआ था | बचपन से ही साहित्य में रूचि इस लेखिका ने दर्जनों उपन्यास और पुस्तके लिखी हैं | पटना के  ए० एन० कालेज  के स्नातकोत्तर हिदी विभाग से अवकाश प्राप्त कर बर्तमान समय में दिल्ली में रहकर साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय हैं |

Author: Team MithilaConnect

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