तैरते जहाज जैसा हैं भागलपुर का अजगैवीनाथ महादेव मंदिर !

सुल्तानगंज प्राचीन काल का एक स्थान है | जो भागलपुर से २६ कि०मी० पश्चिम में स्थित है  | यहाँ उत्तरायनी गंगा बहती हैं | गंगा नदी के बीच ग्रेनटिक पत्थर की चट्टान पर अजगैबीनाथ महादेव की मंदिर स्थित है |

Ajgaibinath Temple Story  Bhagalpur

बाढ़ के दिनों में यह मन्दिर एक तैरते हुए जहाज कि तरह दिखाई पड़ता है | उत्तरवाहिनी गंगा होने के कारण देश के विभिन्न भागों से यहाँ तक कि विदेशों से भी लाखो कि संख्या में कांवरिये यहाँ आते हैं और कांवर में गंगाजल भर कर बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाने के लिए पैदल ही झारखंड स्थित देवघर को चल पड़ते हैं |

क्या कहती हैं मान्यताएं

ऐसी मान्यता ह है कि जब भागीरथ कि प्रयास से गंगा का स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर अवतरण हुआ था तो उस समय उनका वेग बहुत ही तेज था | भागीरथ के रथ के पीछे पीछे दुद्ती हुई जब गंगा सूल्तानगंज पहुंची तो एक पहाडी पर स्थित जह्नु मुनि की आश्रम को बहाकर ले जाने के लिए अड़ गयी |

इससे जह्नु मुनि बहुत क्रोधित हो गए और अपनी तपो बल से गंगा को अपनी चुल्लू में उठाकर पी गए | फिर भागीरथ के बहुत आग्रह करने पर जह्नु मुनि कुछ नरम हुए और अपनी जांघ को चीर कर गंगा को बाहर निकाला | जहनु मुनि के जंघा से निकलने के कारण गंगा का नाम जाह्नवी पड़ा |

दुसरी पौराणिक कथा है कि जब गंगा का स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर अवतरण हुआ था तो उनकी गति को रोकने के लिए भगवान् शिव ने अपनी जटा खोलकर गंगा के प्रवाह मार्ग में आकर खड़े हो गए | शिवजी के इस चमत्कार को देख कर गंगा वहां से गायब हो गयी | बाद में देवताओं के निवेदन पर भगवान् शिव ने अपनी जाँघों के नीचे से गंगा को बहने का मार्ग दिया | यही कारण है कि पुरे भारत वर्ष में सिर्फ यहीं पर गंगा उत्तर दिशा में बहती है |

भगवान शिव यहाँ स्वयं आपरूप से उत्पन्न हुए थे जिस कारण वे अजगवी महादेव कहलाये | कहा जाता है कि जो भी भक्त श्रावण महीने में बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाने के लिए कांवर में गंगाजल भरने आते हैं , वे इस मन्दिर में आकर भगवान भोले कि पूजा अर्चना और जलाभिषेक करना नहीं भूलते |

एक अन्य कथा के अनुसार आदि काल में मन्दिर के कोई महंथ अजगैबीनाथ मन्दिर से देवघर मन्दिर को जोड़ने वाले भूमि के नीचे से ही एक गुप्त मार्ग बनाए हुए थे | इस गुप्त मार्ग से होकर वे प्रति दिन देवघर के बाबा बैद्यनाथ के मन्दिर में जल चढ़ाने के लिए प्रति दिन जाया करते थे | उस गुप्त मार्ग का पता लगाने के लिए आधुनिक इंजीनियरों ने बहुत कोशिश की , लेकिन वे सफल नहीं हुए | इस गुप्त मार्ग का दरबाजा आज भी मन्दिर के पास स्थित है |

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