मधुबनी में है मिथिला का प्रसिद्द प्रबल-सिद्धपीठ भगवती स्थान उचैठ

Ucchaith Temple Madhubani

भगवती स्थान उचैठ  मधुबनी जिला के बेनीपट्टी अनुमंडल से मात्र ४ किलोमीटर की दुरी पर पश्चिम दिशा की ओर स्थित है|  यह स्थान मिथिला में एक प्रसिद्द  सिद्धपीठ के नाम से जाना जाता है |

भगवती मन्दिर के गर्भगृह में माँ दुर्गा सिंह पर कमल के आसन पर विराजमान हैं | दुर्गा माँ सिर्फ कंधे तक ही दिखाई देती हैं , कंधे से उपर इनका सिर नहीं है | इसलिए इन्हें छिन्नमस्तिका दुर्गा भी कहा जाता है |

माँ दुर्गा मन्दिर के पास ही एक बहुत बड़ा स्मशान है , जहां बड़ी संख्या में तन्त्र साधक आज भी साधना में लीन रहते हैं |इस स्थान पर जो साधक जिस मनोकामना से माँ दुर्गा की दर्शन करते हैं , वो वहां से खाली हाथ वापस नहीं आते हैं | कहा जाता है कि भगवान राम जनकपुर की यात्रा के समय यहाँ रुके थे |

महाकवि कालीदास को दिया था वरदान

Kalidas Ucchaith

कहतें हैं दुर्गा मन्दिर से पूर्व दिशा की ओर एक संस्कृत पाठशाल थी | संस्कृत पाठशाला और मंदिर के बीच एक नदी बहती थी |  कालीदास एक महामूर्ख व्यक्ति था | कालीदास का विवाह राजकुमारी विद्द्योतमा से  छल द्वारा करा दिया गया था  |

विद्द्योतमा परम विदुषी महिला थी |  वह ये नहीं जानती थी कि कालीदास महामूर्ख है | जब उसे यह बात मालुम हो गयी तो उसने कालीदास तिरस्कार कर  और ये भी कह  दिया कि जब तक उन्हें  संस्कृत का ज्ञान नहीं हो जाता वापस घर ना आयें |  कालीदास अपनी पत्नी से अपमानित होकर उचैठ भगवती स्थान आ गए और वहां के आवासीय संस्कृत पाठशाला में रशोइया का कार्य करने लगे|

समय बीतने लगा | कुछ दिनों के बाद वर्षा ऋतू शुरू हो गयी  | एक दिन घनघोर वर्षा होने लगी रात-दिन वर्षा होने के कारण नदी में बाढ़ आ गयी |फिर भी वर्षा रुकने का नाम नहीं | नदी में पानी की धारा भी तेज गति से बहने लगी | शाम भी होने वाली थी | मंदिर की साफ़ सफाई , पूजा पाठ , धुप दीप , आरती सारी  व्यबस्था पाठशाला के छात्र ही करते थे |

शाम हो गयी थी | मंदिर में दिया भी जलाना था , लेकिन भयंकर वर्षा और नदी में पानी की तेज धारा के कारण वे लोग मंदिर जाने में असमर्थ हो गए थे | सभी छात्रों ने मुर्ख कालीदास  को ही मंदिर में दिया जलाने को कहने लगा , कालीदास मन्दिर जाने के लिए तैयार हो गया | छात्रों ने कालीदास से यह भी कहा कि मंदिर में दिया बाती दिखाने के बाद कोई निशान लगाना नहीं भूलना |

कालीदास मंदिर जाने के लिए नदी में बिना कुछ सोचे कूद गया | किसी तरह तैरते डूबते वे मंदिर पहुंच गए | मंदिर के भीतर गए और दीप जलाए | उनहोंने मन में सोचा कि निशान लगाने के लिए तो कुछ लाये नहीं | सोच ही रहा था कि उनकी नजर दीप जलने बाली स्थान पर पड़ी | जलने बाली दीप के उपर काली स्याही उभर गयी थी | उसने सोचा इसी से ही निशान लगाउंगा | फिर उसने अपनी दाहिने हथेली को स्याही पर रगड़ा| अब वह निशान देने के लिए जगह खोजने लगा |

मंदिर के चारों ओर सभी जगह काली स्याही का निशान पहले से ही लगा हुआ था | निशान लगाने के लिए कोई स्थान नहीं देख उसने सोचा क्यों न भगवती के मुखमंडल पर ही निशान लगा दिया जाय क्योंकि वहां पहले से कोई निशान नहीं लगा हुआ है | यह सोचकर जैसे ही अपना श्याही लगा हुआ दाहिना हाथ भगवती के मुखमंडल की ओर निशान लगाने के लिए बढ़ाया तो भगवती प्रकट होकर कालीदास के हाथ पकड़ कर कहने लगी अरे महामुर्ख तुझे निशान लगाने के लिए मंदिर के अंदर और कोई स्थान नहीं मिला |  हम तुम पर बहुत प्रसन्न हैं जो तुम इस विकराल समय में नदी तैर कर कर मंदिर में दिया जलाने के लिए आये हो | मांग कोई वर मुझसे मांग |

कालीदास भगवती के  बचन को सुन सोचने लगा कि मुर्ख होने के कारण ही अपनी पत्नी से तिरस्कृत हूँ | अतः उसने भगवती से विद्द्या की याचना की | माँ ने तथास्तु कहते हुए कही कि आज रात भर में जितने भी पुस्तक को तुम छू सकते हो छू लो सभी पुस्तकें  तुम्हे याद हो जायेगी | यह कहते हुए माँ अंतर्ध्यान हो गयी |

वह वापस पाठशाला आया | खाना बना कर सभी छात्रों को खिलाया | अब वह छात्रों  के नीचे वर्ग की पुस्तक से लेकर उच्च वर्ग तक सभी पुस्तकों को रात भर में स्पर्श कर  लिया | पुस्तक स्पर्श करते ही माँ की कृपा से सारा पुस्तक उन्हें कंठस्त हो गया |

उन्होंने काव्य पुस्तक भी लिखी | यथा कुमार संभव , रघुवंश और मेघदूत आदि |

भगवती स्थान उचैठ में कालिदास का  चित्रमय परिचय 

Temple in Ucchaith

मन्दिर के कैम्पस में एक मंडप है जिसमे कालीदास की जीवन की घटनाओं का वर्णन चित्रों के द्वारा दर्शाया गया है | मंदिर में सुबह शाम आसपास के लोग आते हैं और मैया की पूजा अर्चना तथा आरती में भाग लेते हैं | आश्विन महीने की नवरात्रा यहाँ बहुत ही धूम धाम से मनाया जाता है | आसपास के लोग यहाँ आते हैं | अष्टमी और नवमी के दिन यहाँ हजारों की संख्या में बलिप्रदान दिया जाता है |

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