विद्यापति बंगाली थे या मैथिल ? (Vidyapati- A Maithil or a Bengali)

आलेख


बिहार के मधुबनी जिले का नाम साहित्य , कला ,विज्ञानं , वीरता ,धैर्य ,साहस ,भक्ति , सौंदर्य एवं अन्य क्षेत्रों में स्वार्णाक्षरों में अंकित है। यहाँ की अनेक विभूतियां अपने तेज प्रखर से भारत भूमि को महिमा मंडित करती रही है।

इन्ही विभूतियों में एक –  कोकिल विद्यापति थे  जिनका जन्म  प्रान्त के मधुबनी जिलान्तर्गत जरैल  परगना के बिस्फी  में हुआ था। संभव है प्राचीन कॉल  में यहाँ  किसी राजा का गढ़ रहा हो क्योंकि इस ग्राम को गढ़  भी कहा जाता है।

विद्यापति का जन्म-काल अत्यंत विवादास्पद है। जन्म -तिथि का सही आंकलन नहीं हो पाया है। ऐसी मान्यता है कि तत्कालीन राजा देव सिंह की मृत्यु  के बाद राजा शिव सिंह ५० वर्ष के उम्र में सिंघासनारूढ़ हुए और  समय विद्यापति उनसे २ साल बड़े थे  अर्थात १४१२ ई० में विद्यापति ५२ सालके थे । अतः विद्यापति   का जन्म काल १३६० ई० में निश्चित होता है। जन्म काल  की भांति इनका मृत्यु काल भी विवादास्पद रहा है। शिव सिंह ने १४१३ ई ० तक राज किया  था। उनकी मृत्युके ३२ वर्ष बाद अर्थात सं १४४७ ई० में विद्यापति ने शिव सिंह को स्वप्न में देखा था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है  कि विद्यापति का मृत्य-काल सन १४५० ई ० के  कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी के लगभग है।

कहा जाता है कि विद्यापति को मृत्यु का आभास पहले ही हो गया था। ऐसा सुनकर सभी परिजनों ने विद्यापति को डोली में बैठाकर ससम्मान-गंगा तट देह – त्याग के लिए विदा कर दिया।जब वे बाजिदपुर (बेगुसराय ) पहुँचे तो शाम हो गई और कहारों ने भी थक कर डोली वहाँ  रख दी|

विद्यापति ने कहा कि मैं बूढ़ा तो इतनी दूर चला आया  क्या मेरे लिए गंगा माता थोड़ी दूर भी नहीं आ सकती है ?

तभी बगल से धरा फोरते हुए गंगा जी वहाँ तक पहुँच गई और विद्यापति गंगाजल में अंतर्ध्यान हो गए।

बंगाली या मैथिल

Vidyapati belonged to Mithila or Bengal has always been a topic of debate

विद्यापति बंगाली थे या मैथिल ? यह प्रश्न भी विवादास्पद रहा रहा है। एक ओर जहाँ उन्हेँ बंगाली सिद्ध किया  गया था वहीं दूसरी ओर राज कृषण मुखोपाध्याय ने जून १८७५ ई ० में ‘वंगदर्शन ‘में एक प्रमाणिक निबंध लिखकर उन्हें मैथिली कवि सिद्ध करते हुए इस विवाद का अंत कर दिया। इसे वंगीय विद्वान महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री,जस्टिस शारदा चरण मिश्र एवं नागेंद्रनाथ गुप्ता ने भी स्वीकार कर लिया।

प्रेरणादायी माँ भगवती का मंदिर,नदी, गढ़ (पाठशाला) छात्रावास-भूमि,आवास  की भूमि,तरहरा आदि स्मृति चिन्ह उनके जन्म स्थान  पुष्टि करते हैं। जैसा की दान-पत्र में उल्लेखित है बिस्फी ग्राम विद्यापति को राज  सिंह ने दान स्वरुप दिया था।

किद्वंती है कि  बिस्फी में   २० साल तक अकाल पड़ी थी। अकाल से ग्रस्त उनके वंशजों ने बिस्फी छोरकर  सौराठ आने वक्त अपने साथ माँ भगवती को भी लाना चाहा। परन्तु माँ ने स्वप्न देकर बिस्फी नहीं छोरने की इच्छा व्यक्त की। तब से आजतक उनके वंशज आश्विन नवरात्रा की अष्टमी तिथि को अपनी देवी की पूजा -अर्चना करने बिस्फी आते हैं।

और १९६० के दशक तक बिस्फी के लोग सौराठ जाकर उनके वंशज को कर देकर पत्तिया कराते थे। भ्रमवश कुछ लोग विद्यापति को नाई (हजाम ,ठाकुर )भी साबित करने लगते हैं ,क्योकि वहां नाई परिवार है और ब्राह्मण परिवार  नहीं है। यह बिलकुल निराधार है। नाई परिवार सात पीढ़ी पूर्व यहाँ आये थे जिन्हे  स्व० अनूप राउत ने बलहा से लाकर बसाया था।

कवि कोकिल विद्यापति के जीवन परिचय के सम्बन्ध विस्तार से बात करें तो वे एक काश्यप गोत्रीय ब्राह्मण थे जिनकी दो पत्नियाँ थी |उनकी पुत्र वधुओं में से एक चन्द्रकला देवी महान कवियित्रियों में से एक थी |मिथिला के ताकतवर राजा – शिवसिंह उनके परम मित्र थे |

किंवदन्तियाँ

विद्यापति के जीवन से सम्बधित अनेक किंवदंतियाँ प्रचलित हैं।

कहते हैं कि विद्यापति की भक्ति से वशीभूत होकर शंकर जी इनके यहां उगना नाम से नौकर बनकर रहने लगे। कवि को इस रहस्य का पता नहीं था। एक  उगना के साथ राज-रजवारा जा रहे थे कि रास्ते में दैवी- प्रेरणा से उन्हें जोर से प्यास लगी। व्यग्र होकर होकर कवि ने उगना से पानी लाने के लिए कहा।

आस-पास पानी का स्रोत नहीं था। फलतः भक्त के प्राण रक्षार्थ उगना ने जटा  से गंगाजल निकालकर कमंडल में भरकर कवि को पीने के लिए दिया। कवि को स्वाद समझते  नहीं लगी। झट बोल उठे तुम यह जल कहाँ से लाये हो,वह स्थान मुझे तुम दिखाओ। अनेक बहानों के उपरांत भी जब कवि ने हठ नहीं छोड़ा तब उगना जटाधारी शंकर के रूप में प्रकट हो गए।  मानने को तैयार नहीं हुए तब उगना ने गंगा को अपनी जटा में समेटे रूप में प्रकट हो विद्यापति को दर्शन  दिया।

विद्यापति उनके चरणों पर गिरकर विलाप करने लगे।उगना ने चरण छुड़ाते हुए विदा लेनी चाही। परन्तु  नहीं माने। तब उगना उनसे इस भेद को नहीं खोलने का वचन लेकर सेवक बनकर रहने लगा। फिर दूसरी बार राज-दरबार जाने का कार्यक्रम तय हुआ। विद्यापति की पत्नी ‘सुधीरा ‘ ने उगना से जलावन लाने को कहा। नित्य की भांति वह बेलपत्र-फल लेकर पहुंचा। जलावन नहीं देखकर सुधीरा जलते जलावन से उगना को मारने दौड़ी। उधर पूजा पर बैठे विद्यापति चिल्ला उठे -‘साक्षात महादेव पर प्रहार। ”महादेव” शब्द सुनते ही उगना अंतर्ध्यान हो गया।

दूसरी किंवदंती है की एक बार दिल्ली का सुलतान , राजा शिव सिंह को पकड़ कर दिल्ली ले गया। उन्हें छुड़ाने विद्यापति स्वयं दिल्ली गए। सुलतान को अपना परिचय दिया और वे अदृश्य  का भी दृश्य के समान वर्णन करते हैं।

सुलतान बतौर परीक्षा इनको संदूक में बंद करा कर कुऐं में लटकबा दिया और आदेश दिया कि कुऐं के ऊपर जो कुछ हो रहा हो उसका वर्णन करो। उसी समय कोई दासी वहां आ कर झुकते हुए आग फूकने लगी। विद्यापति वर्णन करने लगे-  “सुंदरि निहुरि -निहुरि फूंकू आगि ,तोहर कमल भमर मोर देखल मदन उठल जागि।” इस कविता से सुलतान बहुत प्रसन्न हुआ और उसने तुरंत शिव- सिंह को मुक्त कर दिया।

रचनाएँ

विद्यापति  ने संस्कृत ,अवहट्ट और मैथिली भाषा में अनेक पुस्तकों की रचना की है जिनमें भू-परिक्रमा,पुरुष परीक्षा लिखनावली शैवसर्वस्वसार,भूतपूराण संग्रह,गंगावाक्यावली,विभागसार दानवाक्यावली,दुर्गाभक्ति तरंगिनी,गयापत्तलक,वर्षकृत्य,क्रीर्तिलता,कृतिपताका,पदावली तथा गोरक्ष-विजय प्रमुख है।

विद्यापति वस्तुतः संक्रमण काल के प्रतिनिधि कवि हैं। वे दरबारी होए हुए भी जन कवि हैं। श्रृंगारिक होते हुए भी भक्त हैं ,शैव ,शाक्त या वैष्णव कुछ भी होते हुए भी वे धर्म निरपेक्ष हैं। ऐसे समन्वयवादी कवि को किसी सम्प्रदाय विशेष की सीमित परिधि में बांधना अनुचित है। इतिहास ,भूगोल  , धर्मशास्त्र ,नीतिशास्त्र ,कूटनीतिशास्त्र ,गणित और अन्य विविध विषयों पर  विद्यापति  का  पूर्ण अधिकार था।

उन्होंने लोक भाषा की महत्ता को उजागर किया है।धन के लोभ में वृद्ध व्यक्ति से नवयौवना बेटी विवाह किये जाने की तत्कालीन सामाजिक कुरीति पर अपने कविता द्वारा चोट किया । इसी प्रकार दंड (खरही) से मापकर बाल  विवाह किये जाने की कुप्रथा के फलःस्वरूप लड़की  पहले युवती हो जाती थी और लड़का बाद में युवावस्था को प्राप्त होता था। उन्होंने अपनी कविता के द्वारा इस कुप्रथा पर चोट किया ।

शंकर और विष्णु के विभिन्न स्वरुप का कवि विद्यापति ने   अच्छा वर्णन किया है। विद्यापति एक कालजयी महाकवि थे आज भी मिथिलांचल की अमराइयों में उनकी कोकिल-काकली प्रायः प्रत्येक मांगलिक अवसर पर सुनाई देती हैं।

Author: Team MithilaConnect

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2 thoughts on “विद्यापति बंगाली थे या मैथिल ? (Vidyapati- A Maithil or a Bengali)

  1. May i have details of Babu Umrao Singh,commander of Raja Narendra,who sacrificed for freedom of Mithila.
    Thanking you,
    Kameshwar Singh,descendant of great warrior-Babu Umrao Singh,
    Village+PO-Basuki Bihari,Via-Madhwapur,District-Madhubani

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