मिथिला में दम तोड़ती सिक्की की अनुपम कला !

सिक्की घास से घरेलु उपयोग की सामान जैसे डलिया , डोलची ,और अनेक सामान बनाये जाते हैं जो देखने में बड़े ही सुन्दर और मनमोहक लगते हैं। शहरों में तो बड़े-बड़े घरों में सजावट के सामान के रूप में सिक्की घास द्वारा निर्मित वस्तुऐं आलमारियों एवं दीवारों पर इस तरह से सजाये जाते हैं कि घर में प्रवेश करते ही आगंतुकों का ध्यान उस ऒर चला जाता है।

वस्तुतः सिक्की कला मिथिला की गरीबी का सौंदर्य है। मिथिला के लोगों की कठिन परिस्थितियों में रहनेवाली जीवन एवं कार्यशैली से सिक्की कला प्रमुख रूप से उभर कर निकला है। मिथिलांचल की ग्रामीण क्षेत्रों में सिक्की घास, मुंज घास और खर से विभिन्न प्रकार के सामानों का निर्माण कर उसे शादी- विवाहों के अवसर पर बेच कर जीविकोपार्जन करतें हैं। गरीब और दलित वर्ग की महिलायें पोखर , दियारा और तालाबों में उपजी घास को काट कर हाट-बाज़ारों में बेचते हैं साथ ही इससे बनी हुई अनेक प्रकार की कलाकृतियों को बाजार में बेच कर महिलाएं अपनी आमदंनी के स्रोत का एक नया जरिया बनाती हैं।

Sikki Art of Mithila region in Bihar displayed at 26th January Parade at New Delhi

सिक्की कला की वर्तमान स्थिति

उत्तरी बिहार के सीतामढ़ी , मधुबनी और दरभंगा जिला की औरतें मिथिला पेटिंग और सिक्की कला की कार्य करती हैं। यहाँ की मिथिला पेंटिंग को तो देश-विदेश में प्रचार -प्रसार कर सम्मान मिला जबकि सिक्की कला इन सब अभावों एवं अन्य कारणों से पिछड़ी हुई है। मिथिला में सदियों से सिक्की कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक फलती फूलती रही। लेकिन बेरोजगारी और गरीबी के कारण पिछले पचीस-तीस वर्षों से मिथिला के लोगों का भारत के बड़े-बड़े शहरों में पलायन होता आ रहा है जिसके कारण यहां सिक्की कला दम तोड़ने की स्थिति में आ गयी है।

वर्तमान समय में यह कला सम्पूर्ण मिथलांचल से सिमट कर मात्र रैयाम ,सरिसवपाही ,उमरी बलिया ,यददुपट्टी ,एयर करुणा मल्लाह गॉंव जो दरभंगा ,मधुबनी और सीतामढ़ी जिला में स्थित है, तक ही रह गयी है। पिछले कुछ दिनों में सिक्की कला को सरकार के द्वारा व्यावसायिक आधार मिली है जिसके कारण सिक्की कला से जुडी हुई महिलाओं की आर्थिक स्थिति में सुधार आया है|

क्या होती है सिक्की ?

Sikki is a kind of wild grass found in abundance by the side of pond or swamp in Mithila region of Bihar

सिक्की की उपज नदी , तालाबों के किनारे दलदल वाली जमीन पर होती है।सम्पूर्ण मिथिलांचल में इसकी प्रचूरता है।यहाँ से पलायन करने वाले जन को रोक कर इस कला से निर्मित होने वाले वस्तुओं का स्थान देश के अन्य भागों में बनने वाली कला कृत्यों में एक विशिष्ट स्थान रख सकता है।

सिक्की कला में सिक्की घास के साथ मूँज और खर का भी प्रयोग होताहै। समय के साथ-साथ सिक्की कला अपने आप को विविधता के तौर पर हाथ पंखा,पौती (ट्रे),टेबुलमेट,आईने का फ्रेम,मौनी और खिलौना के रूप मेंअपने आप को ढाल लिया है| मिथिलांचल में जिस घर से बेटी विवाह के बाद अपने मायके से ससुराल विदा होती है तो साथ में सिक्की कला से बने हुए बहुतेरे सामान दिए जाते हैं ताकि उसका नया घर परिवार सुसंस्कृत और कला के प्रति समर्पित होगा|

सिक्की कला के औजार

कारीगर सिक्की को पहले कई रंगों में रंगते हैं और फिर टकुआ जो लोहे की एक मोटे सुई की तरह होती है एवं कैंची से बहुत तरह की आकृतियां बनाते हैं। मिथिला पेंटिंग में जिस तरह दुर्गा ,आँख,गुलदान,शिव,नाग-नागिन ,कछुआ,आम का पेड़ ,कदम्ब,सूर्य,मछली आदि का चित्र बनया  जाता है ,मधुबनी पेंटिंग की  तरह सिक्की कला में भी इन चित्रों को उकेरा जाता है। बाजार में सिक्की आर्ट से हुई मांग बढ़ी है। अब वे बाजार में मांग के अनुसार बनाने लगे हैं।

सिक्की घास को गर्म पानी में उबाल कर उसे अधिक रंगों में रंगा जाता है और उससे भिन्न-भिन्न प्रकार के सामान बनाए जाते हैं | सिक्की कला को विकसित करने में मुस्लिम महिला कारीगरों की भी मुख्य भूमिका हो रही हैं नाजो ख़ातून ने तो देवी काली और भगवान शिव की मूर्ति भी सिक्की घास से बना कर महारत हासिल की है | शहरों में तो इस कला के अच्छे कद्रदान होने के कारण कारीगरों द्वारा बनाए गये वस्तुओं की बिक्री ५०० रु० से १००० रु० तक हो जाती है | लेकिन गाँवो में यह धंधा फायदेमन्द नहीं है|

बाहर सम्मानित लेकिन घर में ही उपेक्षित

People from the country and abroad have shown interest in the skikki work but lacks local patronage

सिक्की कला की विशेषता यह है कि इससे घरों एवं दीवारों को सजाया जाता है। वहीं इससे निर्मित वस्तु का प्रयोग मसाले ,गहने,फूलपत्ती,ड्राईफ्रूट्स के काम में लाया जाता है। इस कला के प्रख्यात कलाकार ,विन्देश्वरी देवी और कुमुदनी देवी को राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। विन्देश्वरी देवी की परिवार की महिलायें और इस गाँव की ३५-४० महिलायें अब भी सिक्की कला से जुडी हुई है। पिछले वर्षों से बिहार सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब महिलाओं की उद्धार के लिए 'जीविका ' नाम की एक योजना शुरू की है। यह योजना ने सिक्की आर्ट को एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराया है। इस गाँव के कलाकार अब तो अपनी कलाकृतियाँ ले कर गोवा,कोलकाता,दिल्ली,और चैनई आदि शहरों में होने वाली प्रदर्शनियों में भाग भी लेने लगे है। इस सबके पीछे 'जीविका 'योजना का मुख्य भूमिका है।

मिथिलांचल में शादी के बाद द्विरागमन के समय से बानी वस्तुओं दहेज़ के रूप में दी जाने वाली प्रथा आज भी कायम है। कलाकारों का कहना है की इस कला में जितनी रूचि मिथिला से बाहर देश-विदेश की लोगों की है , उतनी रूचि स्थानीय को भी नहीं है। १०० वर्ष बिहार के पुरे होने पर दिल्ली में एक प्रदर्शनी लगाई गयी थी जिसमें बिहार की बिभिन्न कला की रूपों की तो झांकी थी। परन्तु सिक्की कला का कोई स्थान नहीं था।

सिक्की कारीगरों की स्थिति

Sikki artists in Mithila are struggling to save the existence of this craft

मधुबनी जिला के सरहद शाहपुर ,सरसोपाही,उमरी और लहेरियागंज में सिक्की कला के अनेकों कारीगर हैं जिन्हें सरकार की ओर से कुछ भी सहायता नहीं मिला है। यदि सरकार की ओर से इन कारीगरों को सरंक्षण और सहायता मिले तो यह कला काफी बेहतर तरीके से विकसित होगी देश एवं विदेशों में लोकप्रिय बन जाएगी। सिक्की कला के आधुनिक कारीगर आधुनिक समय के अनुसार इस कला को स्वरुप दे रहें हैं। अब वे सिक्की घास से कुषण ,पेन स्टैंड ,पेपर वेट ,फूलदान,अंगूठी ,कान की बाली,छुरियाँ बना कर सिक्की कला के स्वरुप को बचाने में लगे है।

Mithilesh

Mithilesh

Mithilesh Jha works at MithilaConnect.Com.He keeps an eye on the latest news and happenings in the Mithila region.

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