कैसे जुझारपुर बना झंझारपुर !

कभी दरभंगा महाराज को आश्रय देनेवाला - झंझारपुर ऐतिहासिक एवं धार्मिक गरिमा का एक अदभुत खजाना अपने अंदर में छुपाये हुए है | झंझारपुर मधुबनी जिला मुख्यालय से चौदह मील दक्षिण पूरब में स्थित है| मिथिला के एक प्रसिद्ध विद्वान् डा० विधेश्वर झा का कहना है कि

झंझा अर्थात वर्षा का बेग तथा पुर अर्थात नदी की धार(कमला )की बेगसे उत्पन्न हुई झंझारपुर शब्द |लेकिन झंझारपुर, शब्द उत्पति की यह धारणा एक गैर ऐतिहासिक एवं भ्रामक तर्क है | वास्तव में झंझारपुर की स्थापना चंदेल राजपूत जुझार सिंह के द्वारा किया गया था |जिनके नाम पर इस क्षेत्र का नाम जुझारपुर पड़ा जो कालांतर में झंझारपुर हो गया |

Jhanjharpur is a sleepy town by the side of river Kamla in Madhubani district

वस्तुतः दसवीं शताव्दी में चंदेल राजपूतों ने खजुराहो प्रदेश में काफी महत्ता प्राप्त की थी |चंदेल राज्य में युद्ध में गाँव दान किये जाते थे |गाँव अनुदान में देने का कारण यह भी था कि ऐसा करने से पर्याप्त सैनिक मिल सकेंगे |सामंती पद्धति इसी बात पर आधारित थी| बच्चों में जन्म से ही वीरता के संस्कार डाले जाते थे और जो व्यक्ति युद्ध से झिझकता था,उसे घृणा से देखा जाता था| स्त्रियों को भी वीर योद्धाओं की प्रशंसा करना सिखाया जाता था| किसी स्त्री को अपने पति के युद्ध में मारे जाने पर स्वयं भी मरने के लिए प्रस्तुत होना पड़ता था | स्वेच्छा से हो या विवश होकर ,सती होना रिवाज़ बन गया था |

चंदेल राजपूत थे जुझार सिंह

Jhanjharpur was also associated with the Raj Darbhanga family

राजपूत जातियाँ ११वीं और 12वीं शताब्दी में एक दुसरे के विरूद्ध निरंतर युद्ध करती रही | चंदेल ,परमारों और कल्छुरियों के विरूद्ध युद्ध में व्यस्त रहे |12वीं शताव्दी में चौहानों ने उन पर आक्रमण किया| राजपूतों के बीच आपसी संघर्ष चल ही रहा था कि इसी बीच भारत पर मो० गौरी का आक्रमण हुआ | अंतिम चौहान राजा पृथ्वीराज उसके हाथों पराजित हो गए | गौरी तुर्क अफगान सरदार ऐवक ने १२०२-१२०३ ई० बुंदेलखंड पर आक्रमण किया और चंदेल राजा मर्दीदेव मारा गया | उसके मंत्री अजय देव ने युद्ध जारी रखा | परन्तु अंत में उसने भी कासिंजर के किले को छोड़ दिया | कासिंजर जीतने के बाद ऐवक ने महोबा,खजुराहो आदि पर भी अधिकार कर लिया | अब चंदेल राजपूत बिखर चुके थे | जिसे जिधर सुरक्षित स्थान नज़र आया उधर का ही रुख किया | महोबा के जुझार सिंह के परिवार ने बिहार की ओर रुख किया| इस समय बिहार पर लक्ष्मण सेन का अधिकार था |मगर,तुर्कों ने बिहार पर भी आक्रमण किया और इतियारुद्दीन ने चतुराई से लक्ष्मण सेन को पराजित किया |अब तक तुर्कों का दहशत काफी फ़ैल गया था |ऐसे में चंदेल राजपूत भागकर निर्जन स्थान पर पहुंचे जिसके सरगना जुझार सिंह थे |उनके साथ चमैन और धोबी भी चल रहे थे पूरा काफिला सुरक्षित स्थान समझकर निर्जन में ठहर गया |

रक्तमाला भगवती की स्थापना

जुझार सिंह के वंशज,बाद में सुदै,कुरसो,सिकरिया एवं बाथ में फ़ैल गए | जुझार सिंह के नाम पर इस स्थान का नाम जुझारपुर रखा गया,जो आज झंझारपुर के नाम से जाना जाता है |इन राजपूतों ने उक्त चारों स्थानों पर ‘रक्त्माला’भगवती की स्थापना की | झंझारपुर में यह भगवती झंझारपुर थाना से दक्षिण एक पेड़ के नीचे अवस्थित है | इसे ग्रामदेवी माना जाता है,क्योंकि चंदेलों की कुल देवता धर्मराज माने गए हैं |

बलि प्रथा का विधान

रक्त्माला देवी की सार्वजानिक पूजा वर्ष में एक ही बार अगहन में होती है |इस पूजा में बलि प्रथा का विधान अदभुत है | इसमें मुर्गा,कबूतर,भेड़,छागर,पाठी,पाहुर (सूअर का बच्चा ) की बलि चढ़ाई जाती है, वैष्णव खीर एवं लड्डू भी चढाते हैं |प्रसाद वितरण को लेकर यहाँ अक्सर झगड़ा हो जाया करता था,इसका निपटारा करते हुए महाराज दरभंगा ने व्यवस्था कर दी कि प्रसाद में मुसलमान को मुर्गा प्राप्त होगा ,चमार एवं खतवे को भेड़, खीर आधा-आधा मिलेगा | पाहुर (सूअर) डोम को मिलेगा कबूतर यादव लेंगे पाठी स्थानीय भंडारी परिवार को मिलेगा |यह व्यवस्था मध्य युग से आजतक चली आ रही है| अन्य जातियों को सामान्य प्रसाद मिलता है |

झंझारपुर का दरभंगा राज से सम्बन्ध

झंझारपुर पर राजपूतों के अधिपत्य की चर्चा जिला गजेटियर दरभंगा (१९०७)में ओमाल्लाई ने भी की है |इस स्थान से दरभंगा राज के संबंधों के सन्दर्भ में सुचित करते हुए वे कहते हैं कि दरभंगा महाराज की संताने बचपन में ही गुजर जाया करती थी,तब महाराज प्राताप सिंह (१७६०-१७७६ )ने मुर नामक गाँव के महंथ से संपर्क किया | महंथ झंझारपुर की ओर चला |यहाँ उन्होंने अपनी जटा जलाई तथा कहा कि जो यहाँ निवास करेगा उसे पुत्र उत्पन्न होगा |महाराज प्राताप सिंह ने तुरंत यहाँ ड्योढ़ी बनाना प्रारंभ किया |मगर दुर्भाग्यवश वे निःसंतान ही मरे |ड्योढ़ी भी नहीं बनवा सके | उनके भाई मधु सिंह ने इस ड्योढ़ी को पूरा करवाया | महारानी के प्रसव काल में यहाँ निवास करने के कारण महाराजा छत्र सिंह (१७०२-१७३९) ने झंझारपुर को खरीद लिया |चंदेल राजपूत को ‘नारे दिगर’परगना तथा चौधरी उपाधि दी गई |आज भी यहाँ राजपूत ‘चौधरी’ टाइटिल लगाते हैं |

चंदेश्वर स्थान एवं दरभंगा राज द्वारा झंझारपुर की उपेक्षा करना

महारानियों को प्रसव होने के कुछ समय पूर्व ही यहाँ भेज दिया जाता | राज परिवार के बच्चे का मुंडन संस्कार भी झंझारपुर से कुछ मील दूर चंदेश्वर स्थान में हुआ करता था | कालान्तर में यह प्रथा समाप्त होती चली गयी |अंतिम महाराज महेश्वर सिंह (१८५०-१८६०) का अधिकाँश समय झंझारपुर में ही बीतता था |एक प्रमुख विद्द्वान परमेश्वर झा का कहना है कि १८६०ई० में झाझारपुर में चौथम घाट जाते समय बहेड़ा थाना के पास शंकर रोहाड़ तालाब के किनारे उनकी मृत्यु हो गयी थी |संभवतः इसे अशुभ मान कर बाद के राजाओं ने झंझारपुर की उपेक्षा कर दी |ड्योढ़ी की जगह औद्द्योगिक प्रांगण है तथा ड्योढ़ी भगवती मंदिर के स्थान के आगे दुर्गा मंडप एवं चिल्ड्रेन पार्क बन गया है |

औद्द्योगिक गाँव

बहरहाल ओमल्लो को आधार मानकर पी० सी० राय चौधरी ने डिस्ट्रिक्ट गजेटियर दरभंगा (१९६०ई०) में सूचित किया है कि झंझारपुर एक बड़ा तथा औद्द्योगिक गाँव है ,जो स्थानीय लोगों द्वारा कांस्य के वर्तन बनाने के लिए मशहूर है |ख़ास तौर पर यहाँ के लोग कांस्य का पनबट्टा तथा गंगाजली (जलपात्र ) बनाया करते हैं| यहाँ कांस्यकार औद्द्योगिक समिती स्थापित है जिसमें ५००सदस्य हैं जो धातु की घंटियों तथा कांस्य के अन्य वर्तन बनाने में व्यस्त रहतें हैं |यहाँ के व्यापारी मुख्य रूप से मुरादाबाद (उत्तरप्रदेश ) से क्षतिग्रस्त ताम्बे, कांस्य तथा अन्य धातु लाकर वर्तन बनाते तथा निर्यात करते हैं |यहाँ से वर्तन, ईख,कपास आदि का निर्यात दरभंगा,पटना,कोलकाता तथा उत्तरप्रदेश के कई स्थानों को किया जाता है |

आर्थिक खाका का विलोप

जिला गजेटियर में जिस झंझारपुर का आर्थिक खाका खींचा गया है , उसका लोप हो चुका है कांस्यकार सहयोग समिती अब अतीत की बात हो चली है |वर्तन उद्द्योग मृत हो चुका है |धातु की बनाने वाले कारीगर अब सरिसबपाही में जा बसे हैं |

विभिन्न जाति के लोगों का निवास

झंझारपुर में विभिन्न जातियों के लोग निवास करते हैं |जुझार सिंह के साथ आये चमार तथा धोबी अल्पसंख्यक हो चले हैं ,क्योंकि महाराजा के आगमन ने यहाँ ब्राह्मणों के साथ-साथ कसेरा ,मारवाड़ी तथा हरिजनों की तादात को तो बढाया ही , भण्डार के रखवाले (भंडारी ) केवट जाति की संख्या में भी काफी बढ़ोत्तरी करवायी | जो हो,कभी राजाओं-महाराजाओं की नगरी तथा कांस्य उद्द्योगों के लिए प्रसिद्ध यह झंझारपुर आज उद्द्योग विहीन हो चला है |राजा महाराजा अतीत के पन्नों में खो गए या फिर भुला दिए गए कान्स्यकारों ने भी अपनी ठौर कहीं अन्य जगह ढूढ़ ली |बांकी बचा है रेलवे स्टेशन ,शिक्षण संस्थान,’रक्त्माला ‘भगवती की महत्ता एवं राजनैतिक दांव-पेंच का अखाड़ा |

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