मिथिला में इन देवताओं का भी है सांस्कृतिक महत्व !

मिथिलांचल में बहुत से लोक देवी-देवताओं की गाथाएं प्रचलित हैं जिनमें से कुछ काव्यात्मक रूपमें उपलब्ध हैं कुछ मौखिक तो कुछ लिखित कहानी के रूप में |कुछ लोक देवी देवता की नाम इस प्रकार हैं लवहरी-कुसहरी,रैयारान्पाल,नैका-बंजारा,लोंरिक,राजा सल्हेश और मीरा सुलतान आदि |लोग रात -रात भर इनकी प्रशस्ति की गाथा गाते हुए जाग जाते हैं और समूंह बना कर सुनते हैं इतना ही नहीं एक मंच बना कर इनके काव्य के आधार पर नाटक भी खेलते हैं |

सल्हेश देवता में सबसे लोकप्रिय !

Salhesh Festival Of Mithila

इन सब देवताओं में संभवतः सबसे लोकप्रिय नाम है राजा सल्हेश का |राजा सल्हेश के जीवन के प्रसंग मिथिला के गांवों में एवं शहरों में भी सुनने को मिलते हैं |राजा सल्हेश दुसाध जाति के थे | वे बहुत ही वीर एवं कल्याणकारी राजा थे |उनका व्यक्तित्व इतना महान था कि मिथिलांचल के लोग उनसे प्रभावित होकर उन्हें देवता के रूप में मानने लगे |मिथिला में सभी गाँवों एवं शहरों में जहां खासकर दुसाध जाति के लोग रहते हैं अलग से एक सार्वजनिक स्थान पर राजा सल्हेश एवं उनके दरवारियों की मूर्ति स्थापित करते हैं जिसे सल्हेश स्थान कहा जाता है |सल्हेश स्थान दुसाध सहित अन्य जातियों के लोगों की आस्था का केंद्र है |मिथिला में बहुत लोग अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप मनौती इन्ही लोक देवों के नाम पर करते हैं |

अन्य महत्वपूर्ण देवी-देवता

Dina Bhadri is an iconic figure among the mushar caste of Bihar

केवट जाति के भीम केवट,केवल महाराज, गांगो देवी अमर सिंह,दुलरा दयाल सिंह,जय सिंह,एवं रैया-रनपाल ,दुसाधों के राजा सल्हेश ,सांसिया महाराज,सोनाई महाराज,खेदन महाराज, सरूप महाराज,चमार जाति के लालवान,डोम जाति के , श्याम सिंह डोम, छेछन महाराज,तेली जाति के बिहुला,हलवाई जाति के गनिनाथ-गोविन्द कारिख पंजियार एवं फेकूराम ,मुसहर जाति के दीना-भदरी ,नाई के बेनीराम , यादव जाति के लोंरिक कृष्णराम तथा कारू खिरहरी आदि ऐसे कुलदेवी और कुलदेवता हैं जिनके पीड़ी,एवं गह्वर को सभी जाति एवं वर्ण के लोग श्रद्धा से नमन करते हैं |

अत्याचार और अन्याय के ख़िलाफ प्रतीक

अधिकतर लोकदेवी एवं लोक देवता की कहानियों में समानता है |ये सभी लोग अत्याचार,अन्याय के खिलाफ लड़ते हैं इतना ही नहीं अपनी-अपनी जातियों में प्रभुत्व के लिए लड़ते भी हैं |सभी लोकदेव स्त्री जाति के प्रति बहुत ही आदर स्नेह रखते थे ये स्त्री जाति के जानवरों की ह्त्या भी नहीं करते थे |अधिकतर लोक गाथाओं के अनुसार  इनकी मृत्यु किसी मायावी बाघिन के द्वारा होती है जिसे डायन मारने के लिए भेजती है | मरने के बाद इनकी आत्मा किसी भगता (झाड़-फूंक करनेवाला वाला) में प्रवेश कर जाती है |उसके बाद लोगों की कल्याण कार्य में लग जाता है |जब इनकी मृत्यु हो जाती है तब लोग इनका गहबर बना कर पूजा करने लगते हैं |

लोककथाओ में है वर्णन

There are numerous folk stories about the gods and their leelas in mithila

ऐसी लोकदेवी एवं लोकदेवताओं की कहानियाँ आज भी सम्पूर्ण मिथिलांचल में बहुत ही लोकप्रिय है |इन लोक गाथाओं का महत्व उन पुरातात्विक खंडहरों उसके अवशेषों से बहुत ही ऊपर है जिनसे सारांश अर्थात निष्कर्ष अनुमान  के आधार पर ही ज्यादा निकाले जातें हैं |अक्सर यह देखा जाता है कि अंधविश्वास के नाम पर लोग  अपनी रीतियों को ,उन परम्पराओं को भूल जाते हैं |लेकिन इन गाथाओं की सांस्कृतिक महत्वों का जब हम समीक्षा करते हैं तो हम पाते हैं की  ये लोक गाथाएँ मानव जीवन को सामाजिक एकता का एक सही सन्देश देता है |ये सब लोक जीवन का स्तम्भ है ,एक रीढ़ है जिसे विज्ञान से तुलना करना मुर्खता है |

एक महत्वपूर्ण बात यह है कि जाति वाद बुरी है या अच्छी यह एक सामाजिक एवं राजनितिक विवाद का विषय बन सकती है लेकिन जातिसूचक संबोधन और लोक लोक जीवन का अन्योंन्याश्रय सम्बन्ध है | लोगों में जो व्यक्तिगत गुण और व्यक्तिगत दोष हैं वे सामाजिक जीवन पर बहुत कम ही असर डालतें हैं |हम देखते हैं कि जातीय समीकरण और लोक परंपरा समाज  में लोग ऐसे बना लिए हैं कि सब कुछ पुरानी लोक गाथाओं के आधार पर ही चलता आ रहा है यह तब तक ठीक चलता रहता है जब तक कि राजनीतिक एवं विकाश इस एकीकरण को बदलने का आवाज नहीं उठाने लगते |बाहरी तत्वों के हस्तक्षेप से सामाजिक रीति रिवाज़,लोक परम्पराएं टूटने लगी हैं और इससे सम्बंधित साज ने लोक गाथाओं से खोया ज्यादा है ,पाया कम है |       

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