एक नदी जिससे अत्यधिक डरते हैं मिथिला के लोग !

आलेख


वैसे नदी का जल मिथिला में न केवल खुशहाली लाता है बल्कि सभी सामाजिक,धार्मिक तथा सांस्कृतिक अवसरों पर इसे पवित्रता का प्रतीक भी समझा जाता है |इसलिए प्रायः प्रत्येक मिथिला वासी (हिन्दू ) के घर में गंगाजल से भरा बोतल सालो भर निश्चित रूप से मिलता है |नदी में प्रतिमा का विसर्जन,छठ पर्व ,पितृपक्ष ,पिंडदान और पूर्णिमा स्नान पुण्यकर समझे जाते हैं |

किन्तु , मिथिला मे भुतही एक ऐसी नदी है जिसे तभी पार किया जा सकता है जब घुटना भर पानी रहता है या बिलकुल सुखी होने पर |तैर कर पार करने का तो सवाल ही नहीं उठता क्योंकि एक तो नदी में उतनी गहराई नहीं है और दूसरी बात धारा बहुत तेज रहती है |नदी को पैदल पार करना भी सिर्फ जानकार लोगों के ही वश का काम है |बालू पर पैर झट पट तेजी से उठाना पड़ता है क्योंकि बालू पानी के नीचे इतनी तेजी से सरकता है कि यदि पैर एक मिनट भी थम जाय तो बालू उसे चारों तरफ से जकडकर  आदमी को  विवश कर गिरा देगा |एक बार गिर जाने पर कुछ ही मिनटों में बालू का इतना ढेर लग जाएगा कि लाश भी ढूढ़ना मुश्किल होगा | कितने मासूम पालतू पशु इसी वजह से प्रतिवर्ष बरसात में भुतही के भेंट चढ़ जाते हैं |राहगीरों को भी लोग पहले ही आगाह कर देते हैं  कि कब और कैसे भुतही को पार किया जाय | इसके बावजूद भी डूब मरने की घटनाएं प्रतिवर्ष होती रहती हैं |

अनिश्चित और खतरनाक चाल ने दिया यह नाम – भुतही बलान

Bhotahi Balan river does not look so frightening on a first look

मिथिलावासी प्रबल धार्मिक भावना के होते हैं जिसके कारण वे नदियों की पूजा सदियों से करते आ रहें हैं |इसके बाबजूद भी जैसा नाम है वैसा ही रोमांचकारी लीला भी है इस नदी भूतही बलान का |कभी सुखा तो कभी पलक झपकते ही भयंकर बाढ़ का गगन भेदी गर्जन ,विशेषता है इस नदी का |भुतही बलान नदी का प्राचीन नाम बिहूल है |लगता है इसकी अनिश्चित और खतरनाक चाल देख कर ही लोगों ने  इसका नाम भुतही रख दिया है |

जबसे कमला बलान की पूर्वी धारा में यह मिल गयी इसका नाम “भुतही बलान’’हो गया मधुबनी जिले के लौकही से पूरब बनरझुला के समीप यह भारतीय क्षेत्र में प्रवेश करती है और वहीँ इसकी मुलाक़ात बलान से हो जाती  है | भारत-नेपाल सीमा से लेकर फुलपरास तक अपने मार्ग के दोनों ओर बहुत बड़े भू-भाग को इसने बालू भर कर सपाट बना दिया है |इसे देख कर किसी ने सच ही कहा था कि सचमुच भुतही बलान जलवाहिनी न होकर बालूवाहिनी नदी बन गयी है |

नदी किनारे बसे हुए प्रमुख गाँव

Bhutahi river creates a havoc in rainy season every year in mithila

इसके किनारे बसे हुए प्रमुख गाँवों का नाम इस प्राकार है -लक्ष्मीपुर-बेलही,परसौनी,महथौर,नरेना,वासुदेवपुर,राजारामपट्टी ,बनगामा,परसा,घोघरडीहा आदि |लक्ष्मीपुर- बेलही एवं लौकहा के बीच  होकर बहने बाली नदी भुतही ही प्रमुख धारा है |इसकी दूसरी धारा नेपाल की तराई से निकल कर लौकही के पूरब मधुबनी जिले में प्रवेश करती है जो पिपराही गाँव के पास निर्मली के उत्तर कोशी तटबंध में घुस कर तिलयुगा नदी में मिल जाती है | लौकहा वाली प्रमुख धारा फुलपरास होती हुई घोघरडीहा के पूरब रेल लाइन को पार करती है | उसके बाद बँसवारी पहुँच कर मध्य बलान (खुटौना वाली ) में समाहित हो जाति है |

भुतही बलान की भयानक लीला

जैसा नाम वैसी ही करतूत है भुतही की |लोग इसकी विनती भय के मारे करते हैं न की धार्मिक श्रद्धा से |पहाड़ों में थोड़ी भी वर्षा होने से पेड़ -पौधों को उखाड़ती और जमीन को ढाहती हुई पागल हाथी की तरह मैदानी इलाके में उतर कर खेत-खलिहान और घर -आँगन को रौंद कर रख देती है |दूर से ही इसका गर्जन सुनाई देने लगता है| आस-पास के लोग जो भुतही के लीला से परिचित हैं इसके गर्जन को सुनते ही भागकर किनारे चले जाते हैं जबकि कुछ बदनसीब और अबोध प्रतिवर्ष इसकी चपेट में आकर अपनी जान गँवा बैठते हैं |जो इसकी बाढ़ में फँस जाता है उसकी लाश भी नहीं मिलती |बालू से ढक कर भुतही खुद ही लाश को दफना देती है |

अभी जिस भुतही की छाती पर बालू भरा नजर आता है ,पलक झपकते ही हजारों हाथियों की शक्ति लिए उसकी जल धारा जैसे सीधे आकाश से फुटकर जमीन  पर गिरने लगते हैं |शुक्र है  कि भुतही बाढ़ से पूर्व सुचना अपनी गगनभेदी गर्जना से दस-पंद्रह मिनट पहले ही दे देती है,जिससे लोग भाग जाते हैं ,नहीं तो सुखी नदी में भी पैर रखने का कोई दुस्साहस नहीं करता |

वैसे इस नदी में बालू इतना भरा रहता है कि लगता जैसे भुतही नदी न होकर बालू की एक सफ़ेद चौड़ी पट्टी हो |वर्ष में अधिकांश समय यह सुखी रहती है किन्तु लोग कहते हैं कि भूत जैसी दिखती है असलियत उससे भिन्न है |जब पानी ऊपर रहता है तो हम कहते हैं की बाढ़ आ गयी है किन्तु वही पानी जब भुतही बालू के नीचे छिपा लेती है तो हमारी नजर धोखा खाकर कहती है की पानी सुख गया |यदि असलियत देखना हो तो बालू हाथ से हटा कर देखिये ,एक फीट नीचे पानी ही पानी मिलेगा |सचमुच इस नदी की लीला अजीबो-गरीब है | जो इससे पूर्ण परिचित है वही इससे निपट सकता है |अनजाने लोगों की यदि मदद न की जाय तो यह शायद ही उन्हें स्वतंत्र रूप में जाने देगी |खासकर बरसात के मौषम में तो बाहरी लोग डर के मारे इधर जाना भी नहीं चाहते |

बाढ़ से बर्बादी

जहां एक और ये नदियाँ जिले में सुख समृद्धि लाती रहीं हैं वहीँ दूसरी ओर इन नदियों ने कहर भी कम नहीं ढाया है | बाढ़ इसका विध्वंशक रूप है जिसके प्रकोप से मधुबनी जिला वासियों की आत्मा प्रतिवर्ष तड़पती रहती है |दरभंगा जिला गजेटियर (१९६४ ) में पिछले एक सौ वर्षों में मिथिला में बाढ़ से हुई बर्बादी का बिस्तृत ब्यौरा दिया गया है |इसे पढने पर यह लगता है कि १८८३ ई ० से लेकर १९६० ई ० तक बाढ़ की प्राकृतिक विपदा जीवन का एक जैसी एक अंग बन गयी है  और यहाँ के लोग जैसे इसके साथ जीने के अभ्यस्त हो गए हैं |   

Author: Team MithilaConnect

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