तिरहुता लिपि का मधुबनी में अस्तित्व

सम्पूर्ण मिथिलांचल की तरह मधुबनी जिले में प्राचीन काल से तिरहुता लिपि का प्रचलन रहा है |इस लिपि को मिथिलाक्षर अथवा मैथिली लिपि के नाम से भी जाना जाती है |स्वतंत्रता के पूर्व तक इस लिपि के व्यापक प्रचलन के संकेत उपलब्ध होतें हैं |आज भी ऐसे अनेक वृद्ध व्यक्ति जीवित हैं ,जिन्हें बचपन में सबसे पहले इसी लिपि का शिक्षा दी गयी थी |वर्तमान में भी श्रोति ब्राह्मणों में निमंत्रण पत्र इसी लिपि में लिखा जाता है |यद्यपि इसके पढ़ने-लिखने वालों की संख्या इतनी नगण्य हो चुकी है कि इसका प्रयोग कहीं-कहीं अव्यवहारिक हो गया है |वर्तमान में वयस्क वर्ग इस लिपि को भूल चुका है |ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय,दरभंगा के पाठ्यक्रम में मैथिली भाषा एवं साहित्य के छात्रों के लिए मिथिलाक्षर का अध्ययन अनिवार्य कर दिया गया है |पांच से दश अंक के प्रश्न भी पूछे जाते हैं| किन्तु इससे विशेष लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है |विभिन्न स्थानों पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएं भी इसके प्रचार- प्रसार के लिए कार्य कर रही है जिससे संभव है कि कुछ लाभ मिल जाए

कैथी,देवनागरी और तिरहुता लिपि

Mithilakshar aka Mithila Script

मिथिला प्राचीन काल में तीन लिपियों के सह अस्तित्व के संकेत मिलते हैं –कैथी,देवनागरी और तिरहुता | इन तीनों लिपियों में लिखी हुई प्राचीन काल की पांडुलिपियाँ उपलब्ध हुई जिनमे तिरहुता में लिखी हुई  पांडुलिपियों की संख्या अधिक है |हजारों की संख्या में तालपत्र रुई के बने कागज़ एवं ब्रिटिशकालीन कागज़ पर लिखे ग्रन्थ कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा ,मिथिला शोध  संस्थान दरभंगा ,चंद्रधारी संग्रहालय दरभंगा बिहार रिसर्च सोसाइटी पटना ,एवं अन्य  शिक्षण   संस्थानों एवं पुस्तकालयों में संग्रहित है |इसके अतिरिक्त क्षेत्र के पारंपरिक विद्वानों के घर में भी कई ग्रन्थ उपलब्ध हैं |सम्पूर्ण मिथिला क्षेत्र में अनेक मूर्तियों,मंदिरों एवं मंदिर शिलापट्टों  पर तिरहुता में लिखे गए अभिलेख भी उपलब्ध होते हैं जो इतिहास के महत्वपूर्ण अन्तः साक्ष्य है |

मधुबनी जिला में सबसे प्राचीन शिलालेख

मधुबनी जिले में सबसे प्राचीन शिलालेख जिला मुख्यालय से 12 किलो मीटर उत्तर में डोखर के देवी मंदिर में जड़ा हुआ है यह लगभग १५० वर्ष पूर्व उसी गाँव में एक मृत नदी  से प्राप्त हुआ था| जनमानुष के अनुसार  उस नदी का नाम  चंद्रभाग  या बिन्दुसर है | शिलालेख के साथ एक मूर्ति भी उपलब्ध हुई थी |अभिलेख प्राचीन तिरहुता में है ,जिसे अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है |एक अन्य अभिलेख झंझारपुर- लौकहा रेल खंड में अन्हराठाढ़ी स्टेशन के निकट कमलादित्य स्थान में विष्णु मंदिर में है | मधुबनी जिले में पंडौल के निकट भागीरथ पुर गाँव में उत्खनन से प्राप्त तिरहुता शिलालेख ओइन्वार्वन्श के अंतिम शासक लक्ष्मीनाथ देव का है जो चंद्रधारी संग्रहालय दरभंगा में प्रदर्शन के लिए रखा गया है |18 वीं सदी के आरम्भ में राघव सिंह के समय का एक शिलालेख सकरी-झंझारपुर मार्ग में विदेश्वर स्थान के मंदिर में जड़ा है | इस प्रकार मधुबनी जिले में भी प्राचीन कल में तिरहुता लिपि के प्रचलन के साक्ष्य हैं |अतः इस क्षेत्र के ऐतिहासिक अध्ययन के लिए इस लिपि का ज्ञान आवश्यक है |

ब्राह्मी लिपि से विकसित

लिपि शास्त्र की दृष्टि से तिरहुता ब्राह्मी लिपि से विकसित है |गुप्त कल में उत्तर भारत में ब्राह्मी का जो स्वरूप था उसका नामकरण कुतिलाक्षर के रूप में किया गया है |इस तथाकथित कुतिलाक्षर का प्रचार नवं शताब्दी तक समस्त उत्तर भारत में था |नवादा से 15 मील उत्तर सकरी नदी के किनारे अफ्संद जफरपुर में प्राप्त आदित्य सेन के अभिलेख में इस नाम का स्पस्ट उल्लेख हुआ है |इसी कुटिल लिपि से आधुनिक देवनागरी तथा तिरहुता सहित बंगला,आसामी,पूर्वी मलय,सिंध एवं मुल्तानी लिपियों का विकाश हुआ है | नवं शताब्दी में नारायण पाल के भागलपुर दानपात्र में तिरहुता का एक स्वतंत्र रूप मिलता है |

बंगला एवं तिरहुता लिपि में समानता

बंगला एवं तिरहुता की उत्पति एक ही कुटिल लिपि से होने के कारण दोनों में पर्याप्त समानताएं हैं किन्तु दोनों में अंतर भी कम नहीं है |बंगला लिपि के अ,क्ष,र एवं ह तिरहुता में क्र स ,रु ,व् ,एवं ट पढ़े जाते हैं |बंगला का इ सर्वथा भिन्न है जो तिरहुता के तू के निकट है |,

Team MithilaConnect

Team MithilaConnect Google Plus

Team Mithilaconnect Local tries hard to get you aware of news , events and information's of Mithila region.Bless US !

Add comment


Security code
Refresh

Writers Requirement

Latest Articles

मॉडर्न-क्लासिक मैथिलि साहित्य की 5 बड़ी हस्तियाँ

mithilas_greatest_writers

सन १८३० के बाद का दौर मॉडर्न मैथिलि लिटरेचर की...

इसलिए इतनी महवपूर्ण हैं अभीष्टफल दायिनी महाशिवरात्रि

Shivratri is associated with many stories of Lord Shiva

शिवरात्रि शिव को बहुत ही प्रिय है जिस कारण इसे...

क्यों वर्जित होतें हैं शुभ कार्य खरमास काल में

Kharmas is observed in Mithila twice a year

हिन्दू पंचांग एवं वैदिक ज्योतिष की गणना के...

Most Read Articles

दरभंगा महाराज के पास था विश्वस्तरीय जवाहरातों का संग्रह!

King Rameshwar Singh of Darbhanga  had the unique Naulakha haar

दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह को अनमोल जवाहरातों...

क्यों प्रसिद्ध है कोइलख ग्राम मिथिला की काशी के रूप में !

Bhadrakali Kokilakshi Temple in Koilakh Village of Madhubani

मधुबनी जिलान्तर्गत कोइलख गॉव राजनगर प्रखंड में...

कौन थे राजा सल्हेश ?

King Salhesh is regarded as a god by people in Mithila

राजा सल्हेश को  मधुबनी जनपदों में सर्वजातीय...