A View of janki temple in Sitamarhi

सीता की वास्तविक जन्मभूमि सीतामढ़ी है या पुनौरा ?

आलेख

कहा जाता है कि  त्रेता युग में  रावण का अत्याचार बहुत बढ़ गया था |

एक बार उसने दंडकारन्य  के ऋषियों से कर के रूप में रक्त मांगा | ऋषियों ने अपने-अपने शरीर से रक्त निकाल कर एक घड़ा में भरा और घड़े को श्रापित कर उसके विनाशकारी होने की बात रावण से कहा |यह जान कर रावण अपने पुराने वैर भाव वश उस घड़े को राजा जनक के  राज्य में गड़वा दिया |

इसके परिणाम स्वरूप सम्पूर्ण  मिथिला में भयंकर अकाल और अनावृष्टि की स्थिति उत्पन्न हो गयी |पूरे मिथिला की प्रजा उस स्थिति से त्रस्त हो उठी | तब ऋषियों ने राजा को हलेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान कर स्वयं हल चलाने  को कहा |

A View of janki temple in Sitamarhi

अकाल से मुक्ति पाने के लिए पुरोहितों ने राजा जनक को मिथिला के पश्चिम भाग में लक्ष्मणा नदी के तट पर यज्ञ करने की सलाह दी थी |तब मिथिला के किले से तीन योजन पश्चिम में जनक  ने यज्ञ स्थल का चयन किया था |

राजा जनक ने खेत में स्वयं हल चलाने का निर्णय लिया |अब तो प्रकृति की शक्तियां अनुकूल हो उठी ,और अकाल से झुलसी हुई मिथिला की भूमि को इंद्र ने  वर्षा  की  बूंदों   से अभिसिंचित किया इसी वक्त पृथ्वी की छाती में हल की नोंक लगते ही सीता प्रकट हुई |

सीतामढ़ी या पुनौरा धाम  ?

Punaura Dham in Sitamarhi

साहित्यांशों के आलोक में जब हम भारतीय मानचित्र पर जानकी-जन्म भूमि को विन्यस्त करने चलें,तो बिहार स्थित सीतामढ़ी जिले में दो स्थान,जो लगभग एक मील की दूरी पर स्थित है ,इसके लिए अपना दावा-प्रतिदावा पेश करते मिलते हैं |’

इनमें से एक है सीतामढ़ी शहर में स्थित जानकी स्थान और दुसरा सीतामढ़ी-शिवहर पथ पर यहाँ से लगभग  दो किलोमीटर की दुरी पर बसा -पुनौरा ग्राम |ज्ञात हो की मिथिला की राजधानी जनकपुर जो नेपाल में है , जो यहाँ से मात्र 40 किलोमीटर उत्तर पूर्व की ओर अवस्थित है |सीतामढ़ी लखन्देई नदी के तट पर बसा  हुआ है |

सीतामढ़ी की इस ऐतहासिक,भूमि से मात्र एक मील  की दुरी पर सीतामढ़ी -शिवहर मार्ग से उत्तर स्थित है -पुनौरा धाम |जानकी जन्म भूमि के दर्शनार्थ निकले हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हुए इस भूमि का दर्शन अवश्य करते हैं |सीतामढ़ी की तरह ही यहाँ भी जानकी मंदिर,सीताकुंड (यहाँ इसे ही उरविजा कुंड कहते हैं ) महराज सीरध्वज की हल कर्षण करती  हुई प्रतिमा तथा सद्द्यः जाता सीता की बाल मूर्ति के दर्शन होते हैं |

सीतामढ़ी की तरह पुनौरा में  भी जानकी नवमी ,रामनवमी,विवाह पंचमी और शिवरात्रि के अवसर पर श्रद्धालुओं की अच्छी भीड़ होती है |यहाँ के निवासी और मंदिर के महंत यह दावा प्रस्तुत करते हैं कि यह स्थली ही सीता की वास्तविक जन्म भूमि है |

व्यक्तिगत मतभेद से उत्पन्न हुआ था विवाद

यहाँ के लोगों से जब सीतामढ़ी स्थित मंदिर की चर्चा की जाती है,तो वे कहतें हैं कि जनक जी ने हलकर्षण  तो यहीं किया था,सीता भी यहीं प्रकट हुई थीं |तदुपरांत जनक ने मड़ई बना कर जहां विश्राम किया,वह जगह अब “सीतामड़ई”से “सीतामढ़ी” हो गयी है |

पुंडरीक ऋषि के आश्रम के रूप में चर्चित इस जगह का प्राचीन नाम पुण्यारण्य बताया जाता है ,जो बाद में पुण्यरसा फिर पुण्य उर्वरा और अब पुनौरा के नाम से चर्चित है |जन्म भूमि से सम्बंधित अबतक  जो भी पुस्तकें आयी हैं ,वे या तो इस विवाद के कारणों पर मौन हैं या किसी एक पक्ष को ही रख कर अपनी भूमिका समाप्त कर दी है |

सीतामढ़ी स्थित एक प्राचीन महंथ अपना नाम गुप्त रखने के अनुरोध के साथ कहते हैं कि यह  विवाद कोई नया नहीं,अपितु तीन-चार सौ वर्ष पुराना है | उनका कहना है कि इसके पूर्व सीता जन्म भूमि के रूप में सीतामढ़ी ही जाना जाता था |तब मंदिर भी सिर्फ यहीं हुआ करता था |

लेकिन दो सवर्ण जाति विशेष के महात्माओं के आपसी मतभेद ने इस विवाद को जन्म दिया |आपसी टकराहट के कारण ही उनमें से एक ने १ मील अलग जाकर एक नए मंदिर की आधारशिला रख दी और उसके सीता जन्म भूमि होने का दावा किया |तब से ही यही स्थिति  है |

ऐतिहासिक शोध का विषय

सीता की वास्तविक जन्मभूमि सीतामढ़ी है या पुनौरा यह एक ऐतिहासिक शोध का विषय है |इस विवाद के पीछे चाहे कारण जो भी हों,लेकिन इतना तो तय है कि जानकी और उनकी जन्मभूमि उपेक्षित होकर,ऐतिहासिक-सांस्कृतिक महत्व की होते हुए भी आज हासिए पर है |

आज जब गौरवशाली नालंदा के प्राचीन भग्नावशेष नव जीवन से अनुप्राणित हो रहें हैं,वैशाली में प्रजातंत्र की विस्मरी समाधि का जीर्णोद्धार हो रहा है,सारनाथ,साँची और बोधगया -जैसे ऐतिहासिक स्थान अपने प्राचीन गौरव को पुनः प्राप्त कर रहे हैं, यह भी आवश्यक हो गया है कि कृषि सभ्यता का विशाल इतिहास छिपाए सीता की जन्म भूमि को भी भारतीय मानचित्र पर उसका उचित स्थान दिया जाय|

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