कौन थे राजा सल्हेश ?

राजा सल्हेश को  मधुबनी जनपदों में सर्वजातीय श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा प्राप्त है| इनके शौर्य एवं राज्य प्रशासन की इनकी अदभुत क्षमता से पूर्ण इनकी गाथाएं , उपन्यास, नाटक, रेडियो नाटक, टेलीफिल्म , लोकचित्रों या नृत्य आदि साहित्यिक सांस्कृतिक माध्यम से अधिक स्पंदित नहीं हो पाई है |

महाराज सल्हेश का जन्म मधुबनी जिले से सटे नेपाल के महिसौथा में हुआ था |उनके पिता का नाम सोमदेव और माँ का नाम शुभ गौरी थी |विराट नगर के राजा श्री हलेश्वर की बेटी सत्यवती से इनका विवाह हुआ था |श्री सल्हेश पूर्व में जयवर्द्धन के नाम से जाने जाते थे पर बाद में सर्वसम्मति से राजतिलक के समय इनका नाम श्री जयवर्द्धन से शैलेश पड़ गया | कालान्तर में शैलेश सल्हेश हो गए |श्री भंडारी तरेगनागढ़ के राजा थे, जिन्हें चार बेटियां थीं |बेटियों ने मालिन सम्प्रदाय को स्वीकार कर लिया था और आजीवन अविवाहित रहने का व्रत ले रखा था | कुसमा, जो सबसे छोटी थी,शिव उपासक एवं सिद्ध  योगिनी होने के  साथ-साथ राष्ट्र्हित्कारिणी भी थी |एक पथ के पथिक होने के कारण सल्हेश को चारों बहनों से प्रेम हो गया | सल्हेश दो भाई थे और उनकी एक बहन बनसपती थी | वे चीन और भूटान के आक्रमण से मिथिला की बार-बार रक्षा करते रहे | इनके प्रतिद्वंद्वी वीर चौहरमल थे, जो बहुत बड़े महर्षि योद्धा थे |

अलौकिक और दिव्य शक्ति प्राप्त कर बने पूजनीय

King Salhesh is regarded as a god by people in Mithila

प्रो० राधाकृष्ण चौधरी लिखित “Mithila in the age of Vidyapati” में राजा सल्हेश की पूजा का और  उनके गीत और गाथाओं पर आधारित नृत्यों का उल्लेख मिलता है स्पस्ट है की राजा सल्हेश की पूजा की परम्परा बहुत प्राचीन है |उस समय मिथिला के मूलवासियों में भी शुद्र राजा हुआ करते थे और अपनी अलौकिक कृति एवं पौरुष के कारण दिव्य व्यक्तित्व को प्राप्त कर पूजनीय बन जाया करते थे |राजा सल्हेश उसी कोटि के मिथिलावासी  थे जो अपने पराक्रम , शौर्य और विशिष्ट व्यक्तित्व के कारण तत्कालीन मिथिला के राजा बने एवं अपने कार्यकाल में अनेक कल्याणकार्य किये | वे अपने कर्म के बल पर देवत्व प्राप्त कर देवताओं की श्रेणी में आ गए और आजतक श्रद्धा,निष्ठां से घर -घर जन-जन में उनकी पूजा होती है |

कैसे होती है उनकी पूजा ?

Rituals being Performed In Salhesh Pooja in Mithila

मधुबनी जनपद के गाँवों में सल्हेश पूजा के समय इनके भगत अथवा भगता अर्द्धनग्न बदन पर लाल रंग की जंघिया गर्दन में माला , एक हाथ में अक्षत और दुसरे हाथ में बेंत रखते हुए भाव-विभोर हो जाते है  |झाल-मृदंग पर भाव -गीत गाते हुए लोग सल्हेश के अध्यात्म में पारलौकिकता का अनुभव करते हैं |गह्वर के सामने मिटटी का E टाइप  का पिंड बनाया जाता है |इसके बगल में बेदी बनायीं जाती है |वहां अधुल, कनैल के फुल सरर , अगरवत्ती, चीनी का लड्डू खीर,पान,सुपारी,गांजा, खैनी,पीनी,जनेऊ,अरवा चावल,झांप, फल,प्रसाद आदि सामग्री रखी जाती है |

सभी ग्रामीण साफ़-सुथरे वस्त्र में निष्ठां से डाली लगाते हैं |भगता के ऊपर बारी-बारी से सल्हेश एवं उनके पार्षदों के भाव आते हैं |गोहारि होता है | प्रसाद अक्षत लेकर मंगल कामना के साथ लोग अपने-अपने घर जाते हैं |भगत को खीर का भोजन कराया जाता है |पूजा आरम्भ करने से पहले भगत सभी लोकदेवताओं का आवाहन भगत गाकर और पूजा ढ़ारकर करता है |व्यक्तिगत पूजा के साथ-साथ साल में एक बार सामूहिक पूजा भी उत्सब के रूप में की जाती है |

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