मिथिला की संस्कृति पर है कर्णाटक राज्य का भी प्रभाव

विद्यापति के युग से ठीक पहले मिथिला में कर्नाटवंश का शासन था इसके संस्थापक मूलतः कर्नाटक के निवासी थे और ये बंगाल से होते हुए मिथिला में आये | इनके साथ दक्षिण के सांस्कृतिक तत्व भी मिथिला में आये और अध्ययन करने पर तत्कालीन कला साहित्य पर उसकी छाप भी देखा जा सकते हैं | विद्यापति के लेखन से संकेत मिलता है कि नाटक का मंचन मध्यकाल  में कर्नातों के प्रभाव से ही मिथिला में शुरू हुआ और आरंभिक रंगकर्मी भी मिथिला में दक्षिण से ही आये | विद्द्वानों की मान्यता है कि मैथिली अपभ्रंश से पृथक स्वरूप भी कर्नाटकों के समय से ही निश्चित हुआ |विद्यापति की भाषा इसीलिए संस्कृत भी है , अवहट्ट भी , और मैथिली भी |

मिथिला में कर्नाट वंश का उदय

Karnaat Era remains at Vachaspati Museum at Anharathadi

वर्ष १०९७ ई. - १०९८ ई. में तिरहुत में कर्नाट राज्य का उदय हुआ जब एक महान शासक नान्यदेव की क्षत्रछाया में कर्नाटो ने सिमरॉवगढ़  को अपनी राजधानी बनायी|यह काल मिथिला का स्वर्ण युग भी कहा जाता है क्योकि इस काल में स्थिरता और प्रगति हुई। नान्यदेव बंगाल के शासको से निरंतर युद्ध में भी अपने राज्य को सुरक्षित रख पाये| अंधराठाढ़ी व उसके आसपास के गांवों से सेन, पाल, कर्नाट वंश के साथ-साथ  बौद्ध विहार के भी सबूत प्राप्त हुए हैं।

पंजी प्रथा की शुरुआत

Panjis are geneological records

कर्नाट वंश ने मिथिला को एक और महत्वपूर्ण सांस्कृतिक विरासत दी पंजी व्यवस्था के रूप में | इसको व्यवस्थित और अद्यतन रखने वाले पंजियार या पंजीकार कहलाते हैं | दरअसल यह मिथिला के ब्राह्मणों एवं कायस्थों की वंश परंपरा का लिखित प्रमाणिक दस्तावेज है | इस व्यवस्था ने मध्यकाल से लेकर अब तक की विकास परंपरा के कई महत्वपूर्ण विवादास्पद सन्दर्भों को स्पस्ट करने में महती भूमिका निभाई है |कहते हैं कि मिथिला के प्रसिद्ध धर्मशास्त्री हरिनाथ मिश्र , जिन्होंने अमृतसार नामक महत्वपूर्ण स्मृतिग्रन्थ लिखा , का विवाह अपनी पितृवंश परंपरा में ही अज्ञानतावश हो गया |भारतीय हिन्दू संस्कार पद्धति में एक मूल-गोत्र में विवाह पाप सामान है | इस तरह की परस्थितियों से बचने के लिए ही कर्नाट वंशीय राजा हरिसिंह देव ने पंजी व्यवस्था शुरू करबायी |

सौराठ सभा और अन्य सभा स्थल

आज भी मधुबनी  के सौराठ गाँव की मेले में इसी व्यवस्था के तहत मैथिल ब्राह्मणों एवं कर्ण कायस्थों का विवाह निश्चित किया जाता है , जिसे सिद्धांत कहते हैं |सौराठ में ही विद्यापति के वंशज रहते हैं |सौराठ के अलावा मिथिलांचल के परतापुर , सझुआर , भकाराइन , बनमाम  , महिषी , बरुआरी , शुक्रसेना , फ़तेहपुर , खम्हार , काला बलुआ और ससौला में भी इस तरह की सभा का आयोजन होता रहा है , पर सबसे प्रसिद्ध सभा सौराठ का ही है |

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