मिथिला की कुछ दिलचस्प लोकोक्तियाँ

मैथिली लोकोक्तियाँ भी मिथिला के लोक जीवन एवं लोक परंपरा की कहानी बयां करती हैं |मिथिला में इन लोकोक्तियों को फकरा कहा जाता है | लोकोक्तियों के विषय किसी बिद्वान ने कहा भी है – ‘लोकोक्तियाँ अनुभवसिद्ध ज्ञान की निधि हैं | मानव ने युग- युग से जिन तथ्यों का साक्षात्कार किया है उनका प्रकाशन इनके माध्यम से होता है |ये चिरकालीन अनुभूत ज्ञान के सूत्र हैं | समास रूप में चिरसंचित अनुभूत ज्ञान राशि का प्रकाशन इसका प्रधान उद्देश्य है |शताब्दियों से किसी जाति की विचारधारा किस ओर प्रवाहित हुई है , यदि इसका दिग्दर्शन करना हो तो उस जाति की लोकोक्तियों का अध्ययन आवश्यक है |’

लोकोक्तियों झलक हैं लोक जीवन और परंपरा की

The strength of maithili literature also lies in its strong foundation in idioms and phrases aka fakra

मिथिला की कुछ प्रसिद्ध लोकोक्तियों के माध्यम से भी वहां के लोक जीवन एवं लोक परंपरा के विषय में जान लेना अपेक्षित होगा | मिथिला में मध्यकाल में सामंतवादी शक्तियां भी सक्रीय थीं | कालान्तर में जमींदारी जाती रही और वैभव भी जाता रहा , परन्तु सामंती मानसिकता नहीं गयी | ऐसी ही प्रवृत्यों के लिए एक लोकोक्ति है –

‘हाथी बिका गेल , अंकुश जोगा क रखने छी |’

इसी तरह एक लोकोक्ति है –

‘ हे रौ हेहरा केहन छें |……. मारि खाई छी नीके छी |’

इस लोकोक्ति में भी सामंती मानसिकता एवं निर्बल की निरीहता दोनों परिलक्षित होती है |

खेत खाय गदहा , मारि खाय जोलहा’,

आदि लोकोक्तियाँ भी ऐसे ही परिवेश में बनी हैं |

गोनू झा पर भी हैं लोकोक्तियाँ

गोनू झा की बुद्धिमत्ता एवं चालाकी के किस्से मिथिला में बहुत प्रचलित हैं | उनहोंने विषम परिस्थितियों से अपने आप को और समाज को किस तरह से बचाया , इस पर किवदंतियां भी बहुत हैं | इसलिए , आज भी कोई व्यक्ति अपने चातुर्य या व्यवहारकुशलता से कोई महान कार्य या दुष्कर कार्य अथवा अचंभित कर देनेवाला कार्य संपादित कर देता है , तो वैसे प्रयासों की सराहना इस लोकोक्ति से की जाती है –

‘ गोनू झा के पइर’ पइर का अर्थ है उपाय |

वैवाहिक लोकोक्तियाँ

Many phrases are also used in the marriages of mithila

विवाह के बाद प्रायः पति-पत्नी का प्रेम परिवार के अन्य सदस्यों को रास नहीं आता | इस सार्वदेशिक मनोदशा पर मिथिला में कई लोकोक्तियाँ प्रचलित हैं |

एक लोकोक्ति है –

‘ हम सुनरी पिया सुनरी , गामक लोक बनरा बनरी’

अर्थात पति और पत्नी यही दो पुरे गाँव इ सुन्दर हैं बांकी सब बन्दर हैं |

एक और लोकोक्ति इसी तरह के आशय से युक्त है –

‘ माय के गोर लगने वंश के गारि , बहु के गोर लगने तीन ढकना दालि |’

 

लोकनिंदा से सम्बंधित लोकोक्ति

मिथिला नदीमातृक प्रदेश है | यहाँ कई बार एक गाँव से दुसरे गाँव जाने के लिए नदी पार करना पड़ता है | कहीं-कहीं तो इन नदियों पर पूल होता है , कहीं बस तैर कर ही जाना पड़ता है | जहां कपड़े उतार कर नदी पार करना पड़ता है , वहां की लोकनिंदा में प्रचलित कथा के आधार पर लोकोक्ति है –

‘अहि नगरी के इएह व्यवहार , खोलू धरिया उतरु पार’|

 

बेरोजगारी से सम्बंधित लोकोक्ति

बेरोजगारी  या उपयुक्त रोजगार न मिलने की समस्या सार्वदेशिक सार्वकालिक रही है | मिथिला में इस पर कई लोकोक्तियाँ है , उनमें एक है -पढ़ै फ़ारसी , बेचे तेल | योग्य या अक्षम व्यक्ति की महत्वाकांक्षा पर लोकोक्ति है -जुमे मियाँ के माड़ नै , खोजे मियाँ ताड़ी’ | कभी-कभी किसी पढ़े-लिखे व्यक्ति की बात गाँव वालों को अनुकूल नहीं लगती |

कभी-कभी किताबी ज्ञान ग्रामीण परिपाटी के प्रतिकूल जाने लगती है| इन परिस्थितियों पर बड़ी सटीक लोकोक्ति है –

‘सभ के लेखे ओझा बताह , ओझा लेखे गाम बताह’|

चौरचन या चौठचन्द्र मिथिला का बड़ा ही लोकप्रिय त्यौहार है |शाम में चन्द्रमा की अराधना के बाद लोगों को पकवान खाने को मिलते हैं | इस पर एक लोकोक्ति प्रचलित हो गयी है -उगह चाँद कि लपकह पूआ’|हठी व्यक्ति के लिए कहाबत है –‘पंचक बात मानब , मुदा खुट्टा ऐतहि गारब’ |अरबा खैब त अबेर किया करब , निर्ल्लज भांटा तीन ठाम कनाह , गुआरक माथ पर पुआर , मियाँ बुझलनि प्याउज, सांझे मुइलाह काना कतेक, बरद त बरद गेल नौ हाथक पगहा गेल , मुइने बरद छ्क्कड़ , सघी बहु सिपाही आदि ऐसी अनेक लोकोक्तियाँ हैं जो मिथिला के जन जीवन के कई रंगों को प्रतिभासित करती हैं |

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