जब खाक छानी भगवान् कृष्ण ने मिथिला के जंगलों की !

आलेख


मिथिला की व्युत्पति राजा निमी के पुत्र मिथि के नाम पर हुई |मिथि ने मिथिला नामक सुन्दर नगरी बसाई , जो विदेह की राजधानी बनी | नगर के निर्माण करने के कारण मिथि जनक कहलाये और तब से मिथिला के राजा का उपाख्य जनक होने लगा | रामायण में निमी से लेकर सीरध्वज जनक ( सीता के पिता )तक जनक वंश की वंशावली मिलती है |तत्कालीन मिथिला नगरी को नेपाल के वर्तमान जनकपुर से अभिन्न माना जाता है |

Lord Krishna and Mithila

कृष्ण का भी है मिथिला से सम्बन्ध

राम के परिवार से ही नहीं ,कृष्ण के परिवार से भी मिथिला का अभिन्न सम्बन्ध रहा है | विष्णुपुराण  के अनुशार , स्यमन्तक मणि को लेकर कृष्ण एवं बलभद्र में विवाद हुआ था | यह मणि शतधन्वा के पास थी , जो मिथिला में ही एक वन में कृष्ण के चक्र से मारा गया था | बलभद्र ने कृष्ण को अर्थलोलुप मानते हुए कृष्ण से और द्वारका से सम्बन्ध तोड़ लिया | वे मिथिला चले गए | वहां विदेहराज जनक ने उनका बहुत सम्मान किया और वे विदेहनगर में ही रहने लगे |

क्या था स्यमन्तक मणि में !

Lord Krishna defeated Jamwant after 18 days of fight to get back the Shyamantaka mani

पुराण के अनुसार स्यमन्तक मणि सूर्य देव धारण करते थे।यह एक चमत्कारी मणि थी  और जिसके पास रहती उस पर अनोखा प्रभाव दिखलाती थी। जैसे सज्जन पास रहती उसका शुभ करती और किसी दुष्ट  के पास अनिष्ट करती। सूर्य ने अपने भक्त, राजकुमार सत्राजित् से प्रसन्न हो कर वह मणि उसे दे दी , सत्राजित ने मणि अपने भाई, प्रसेन को दी , प्रसेन को एक सिंह ने मार डाला । रीछों के राजा जाम्बवान् ने उस सिंह को मारा तो मणि उसे मिल गयी। चूंकि कृष्ण ने इस मणि की प्रशंसा की थी, अतः सन्देह यह हुआ कि उन्होंने उसे चुरा लिया है। इस कलंक से मुक्त होने के लिए कृष्ण ने मणि की खोज में जंगलों की ख़ाक छानी।

इसी पुराण के अनुसार दुर्योधन ने गदायुद्ध विदेह नगर में ही बलभद्र से इसी प्रवास के दौरान सीखा | तीन वर्षों के बाद उग्रसेन आदि यदुवंशियों के बहुत आग्रह करने पर और यह विश्वास दिलाने पर की कृष्ण ने स्यमन्तक मणि नहीं ली थी , बलभद्र द्वारका वापस गए | दरअसल , शतधन्वा ने यह मणि अक्रूर जी को दे दी थी |

कहाँ तक था मिथिला का विस्तार ?

वृहद्विष्णुपुराण के अनुसार पूर्व में कौशिकी नदी से लेकर पश्चिम में गण्डकी नदी तक और दक्षिण में गंगा नदी से लेकर उत्तर में हिमालय तक मिथिला का क्षेत्र विस्तार है | आज भी लगभग यही सीमा मिथिला की मानी जा सकती है | , विशेषकर मैथिली भाषा के प्रचलन एवं प्रभाव के आधार बपार |

आज मैथिली भाषा का प्रचलन के आधार पर जो मिथिला का क्षेत्रविस्तार बनता है , उसमे मधुबनी , दरभंगा , समस्तीपुर , सीतामढ़ी , सहरसा , पुर्णियां, कटिहार किशनगंज , वैशाली , मुजफ्फरपुर , खगरिया , भागलपुर , चंपारण के कुछ हिस्से , बेगुसराय और नेपाल में भारत से सटे तराई के जिले –मोरंग , सप्तरी , महोत्तरी , जनकपुर , सर्लाही , रौताहत आदि शामिल है |

Author: Team MithilaConnect

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1 thought on “जब खाक छानी भगवान् कृष्ण ने मिथिला के जंगलों की !

  1. [2/16, 11:09 PM] Krishna Chandra Jha: मान्यवर यह हमारे क्षेत्र मधुबनी का सौभाग्य है कि आप जैसा कर्मठ अधिकारी मधुबनी को मिला है।संपूर्ण मिथिलांचल मे मधुबनी अपनी संस्कृति, भाषा, पुरातात्विक महत्व के कारण सबसे श्रेष्ठ है।
    इसी संदर्भ मे मै शिवनगर गांव मे अवस्थित पांडव कालीन भगवान शिव के मंदिर जो गंडेश्वरस्थान के नाम से प्रसिद्ध है,को पुरतात्विक श्रेणी मे स्थान दिया जाए।एवम शिवनगर को पर्यटक स्थान श्रेणी का दर्जा दिया जाए।
    श्रीमान द्वारा लिया गया यह निर्णय न केवल बाहरी पर्यटकों को एक विलक्षण पुरतात्विक महत्व की वस्तु को देखने का अवसर मिलेगा ।साथ ही इस स्थान का भी विकास होगा, रोजगार के अवसर मिलेंगे।
    [2/16, 11:20 PM] Krishna Chandra Jha: श्रीमान द्वारा लिया गया यह निर्णय,इतिहास मे ं मील का पत्थर साबित होगा।
    बाबा गंडेश्वस्वर की क्रिपा से आप की यश किर्ति बढ़े।हमारी शुभकामनाएं हैं।
    मिथिलांचल सदैव आपका आभारी रहेगा।
    नीता झा।

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