भड़क उठी थी जब स्वतंत्रता की चिंगारी मिथिला में !

आलेख


प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन ने बिहार में ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी |मिथिला के लोगों को लगने लगा था की संभवतः ब्रिटिश राज समाप्ति ही हो गयी है |यहाँ तक कि , दरभंगा महाराज के प्रति यह संदेह किया जाने लगा वे कंपनी के विरुद्ध तैयारी कर रहे हैं | बाबू कुंअर सिंह के गुरु मधुबनी स्थित मंगरौनी के शंकर दत्त थे जिन्हें गिरफ्तार करने ब्रिटिश फ़ौज मधुबनी आयी थी |२८ अगस्त १८५७ ई० को एच .एस . डाम्पेपर ने कमिश्नर को मशरक थाना जलाए जाने की सुचना दी जिसके बाद कटरा भरवारा , खजौली , लौकहा तक प्रशासन को सतर्क कर दिया गया|१८५७ ई० की क्रान्ति की शुरुआत के समय रेजिमेंट का मुख्यालय संथाल परगना में था जिसे हटाकर भागलपुर ले आया गया था | बाद में गया होते हुए इसे मुजफ्फरपुर ले आया गया था |किन्तु कुछ ही काल बाद जब यह भरोसा हो गया कि मुजफ्फरपुर पर कोई ख़तरा नहीं है तो मजिस्ट्रेट ने बंगाल के मेजर रिचर्डसन से तुरंत दरभंगा के लिए प्रस्थान करने के लिए कहा|इस टुकड़ी में उस समय ३०० सैनिक अपने घोड़ों के साथ एवं ८०० अन्य लोगों का एक बड़ा दल था |दरभंगा पर उस समय भी खतरे की आशंका समझी जाती थी |

बंग-विभाजन के बिरुद्ध आक्रोश का प्रभाव

Khudiram Bose was the youngest revolution to be hanged in the freedom struggle.

बंग-विभाजन ने जिस आक्रोश को जन्म दिया था , उसकी परिस्थिति १९०८ में खुदीराम बोस तथा उनके मित्र प्रफुल्लचंद्र चाकी द्वारा मुजफ्फरपुर बम कांड के रूप में हुई ,जिसने सम्पूर्ण तिरहुत के साथ-साथ समस्त भारतीय जनमानस को झंझोर डाला था | 11 अगस्त १९०८ को खुदीराम बोस को फांसी दी गयी |उसके फांसी दिए जाने की स्मृति में दो-तीन दिनों तक स्कूल बंद रहे |उनके फोटो को लोग बड़े चाव से खरीदते और धीरे-धीरे अनेक बंगाली तरुण खुदीराम बोस नामांकित धोती पहनने लगे |१९१२ ई० का वर्ष बिहार के लिए एक यादगार वर्ष है | इस वर्ष स्थानीय जनता की मांग पर बिहार को बंगाल से पृथक कर एक अलग प्रांत बनाया गया और इसी वर्ष बिहार की ऐतिहासिक भूमि पर भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ |

जलियावाला बाग कांड का मिथिला पर असर

Watson School of Madhubani was center of political activities

१९१९ के जलियावाला कांड ने पुनः एक बार भारतीय जनमानस के साथ ही मिथिला में लोगो को झकझोर कर रख दिया गांधी जी चंपारण से अमृतसर पहुंचे तथा कांग्रेस की सक्रिय राजनीति में कूद पड़े | १९ अप्रैल के तीसरे पहर यह खबर पटना पहुंची | इससे सारे प्रान्त में भारी उत्तेजना फ़ैल गयी |बिहार प्रांतीय कांग्रेस समिति की बैठक १७ और १८ अगस्त, १९१९ को लहेरियासराय में हुई | उसमे लगभग एक हजार लोगों ने भाग लिया उसमे भाग लेने वाले डेलीगेट में सच्चिदानंद सिंह राजेन्द्र प्रसाद , कृष्ण प्रकाश सिन्हा जैसे दिग्गज नेता थे १९२० में नार्थ बुक जिला स्कूल दरभंगा तथा वाटसन स्कूल मधुबनी में भी आन्दोलन का किंचित प्रभाव दीख पड़ा था |

नमक क़ानून का विरोध

१९३०ई० भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का एक निर्णायक मोड़ माना जाता है | गांधी जी की दांडी यात्रा ने पुनः भारतीय जनमानस को एकता के सूत्र में बाँधने का मूल मंत्र दिया ‘नमक’ कानून भंग करो |दरभंगा जिले में ( मधुबनी सहित )श्री सत्य नारायण सिंह के नेतृत्व में स्वयंसेवकों का पहला जत्था १७ अप्रील को नमक कानून भंग करने के लिए पिपरा के लिए रवाना हुआ | पिपरा में रोज नमक बनाया जाने लगा | मधुबनी के किशोरी लाल जो नमक के थोक व्यापारी थे , ने दीप ( झंझारपुर ) के प्रबोध ना० झा एवं श्री नंदन दास ( दीप ) की मदद से झंझारपुर स्टेशन के नजदीक महादेव टिव्रेवाल के गोदाम में नमक कानून को भंग किया तथा आन्दोलनकारियों के प्रेरणा के स्रोत बने |

इधर भारतीय राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदल रहा था | १९३१ में द्वितीय गोलमेज़ सम्मेलन में असफल होकर लौटने पर गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया था | २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा दिया गया जिसे इस सम्पूर्ण क्षेत्र में “बलिदान दिवस” के रूप में मनाया गया | १९३२ में सविनय अवज्ञा आन्दोलन अत्यधिक सक्रिय हो चला था | जेलों में भीड़ नहीं लगे , इसके लिए बिहार – उड़ीसा सरकार ने चुने हुए लोगोंको ही सजा देने का निर्णय किया था | फिर भी बंदियों से बिहार के जेल भर गए थे |

भीषण प्राकृतिक आपदाओ ने किया आंदोलन को धीमा

उधर १९३४ के भूकंप तथा १९३४ एवं ३५ में कमला की बाढ़ ने आन्दोलन की गति को थोड़ा मंद कर दिया | भूकंप के तुरंत बाद दरभंगा राज में लाखों रूपये के तकाबी ऋण देने की घोषणा की थी | भूकम्प पीड़ितों को उस समय जमींदार ने मालगुजारी से छुट दी थी | १९३४ से १९४३ के बीच का समय मधुबनी क्षेत्र में कमला से संघर्ष करने का काल रहा | लगातार आती बाढ़ ने लोगों की कमर तोड़ दी | फिर भी जब १९३९ में द्वीतीय विश्वयुद्ध का बिगुल बजा , तो लोगों के मन में अंग्रेजी सत्ता की समाप्ति की आशा जगी | युद्ध प्रारम्भ होते ही राष्ट्रवाद की धारा बदल चुकी थी | युद्ध नीति के विरुद्ध बिहार में भारी रोष फ़ैल रहा था | १९४० में २६ जनवरी को पुरे विहार में धूम धाम से स्वतंत्रता दिवस मनाया गया |

विचार धाराओं का टकराओ और हिंसक आंदोलन की शुरुआत

Houses were burnt and crops destroyed to create terror by the establishments

दरभंगा जिला (मधुबनी सहित ) जहां ब्रजकिशोर प्रसाद , धरनीधर बाबू , हरिनाथ मिश्र ( कोइलख ) जानकी नंदन सिंह ( मधेपुर ) जैसे गांधीवादी सत्याग्रह के पक्ष में थे | अन्य क्रांतिकारियों की एक लम्बी सूची थी जो हिंसात्मक आन्दोलन के पक्ष में थे , तदनुरूप कारवाई भी कर रहे थे |११ अगस्त के सचिवालय गोलीकांड के बाद लाख मना करने के वावजूद आन्दोलन ने हिंसा का रास्ता अख्तियार कर लिया , जिसमे मधुबनी क्षेत्र ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया |

१४ अगस्त १९४२ को मधुबनी और पंडौल में तार काट दिए गए और रेल की पटरियां उखार दिए गई |मधेपुर थाना पर भीड़ ने आक्रमण कर उसे क्षति पहुंचाई | रहिका रोड पर भी पुल तोड़ दिया गया | रमौली और कई अन्य स् स्थानों पर पुल तोड़ दिए गए |15 अगस्त १९४२ को मधुबनी के वकील कचहरी नहीं गए | संध्या समय थाना के सामने एकत्र भीड़ पर पुलिस ने गोली चलाकर कुछ लोगों को हताहत कर दिया |

बेनीपट्टी रजिस्ट्री ऑफिस पर एक भीड़ ने आक्रमण करके झंडा फहरा दिया | डाकघर तथा थाने पर भी भीड़ ने झंडा फहराया | झंझारपुर थाने के इलाके में सड़क बुरी तरह क्षतिग्रह कर दी गयी थी |१४ से २० अगस्त १९४२ के बीच उत्तेजित भीड़ ने कई थाने पर आक्रमण कर दिया | मधेपुर , झंझारपुर , फुलपरास , मधवापुर , बेनीपट्टी , खजौली ,हरलाखी , लदनियां और लौकाही थानों पर भीड़ का कुछ दिनों के लिए कब्जा हो गया था | स्थिति की गंभीरता को देखते हुए २७ अगस्त को दरभंगा मेडिकल कॉलेज और मिथिला कॉलेज के छात्रों पर धारा १४४ के अंतर्गत 2 सप्ताह तक सडको पर चलने पर प्रतिबन्ध लगा दिया |18 अगस्त को स्कूल एवं कोलेज के छात्रावासों की पुलिस द्वारा तलासी ली गयी |

बिरोध दबाने के लिए अंग्रेज सैनिक दस्तो का दरभंगा आगमन

२० अगस्त को कुछ सैनिक पहुंचे , जिसका संचालन सैलिसबरी कर रहे थे | २१ अगस्त को दो अतिरिक्त अंग्रेज सैनिक दस्ते दरभंगा पहुंचे | जिला मजिस्ट्रेट श्री आर०एन० लिन्स उन्हें लेकर अगले दिन मधुबनी पहुंचा |२२ अगस्त को श्री ए० जे० सेलिसबरी , जो क्रांति का कट्टर बिरोधी था , औपचारिक रूप से जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त कर दिया गया | इसके अनंतर वह अपना अधकतर समय आन्दोलन के दमन में मधुबनी में ही बिताया | सेलिसबरी ने बेरहमी तथा प्रति हिंसात्मक ढंग से आन्दोलन का दमन करना प्रारम्भ किया |२२ अगस्त १९४२ को सैनिकों ने मधुबनी में कुछ लोगों पर गोली चलाई | लगभग सभी थानों में घोर दमन चल रहा था | फुलपरास , लौकही और लौकहा में पुलिस तथा सैनिकों ने अनेक घर जलवा दिए | अनेक लोगों की सम्पति लुटबाई और कुछ लोगों को हताहत किया |

जेल फांद कर भाग निकले थे आज़ादी के मस्ताने

The hazaribaag jail where the historic jailbreak had happened

मधुबनी जिले के नरपतिनगर गाँव के सुपुत्र सूर्य नारायण सिंह ने अपनी अहम् भूमिका निभाई | दरअसल १९४२ की क्रान्ति शुरू होने के समय या उसके दरमियान देश के जेलों में पड़े कुछ देश भक्त जेलों से निकलने और संकट काल में आजादी के लड़ाई में हाथ बटाने के लिए अधीर हो रहे थे | इन्हीं उद्देश्यों से प्रेरित होकर हजारीबाग जेल से ९ नवम्बर १९४२ दीपावली की रात में जय प्रकाश नारायण , रामानंद मिश्र , योगेन्द्र शुक्ल , गुलाब चन्द्र गुप्त एवं शालिग्राम सिंह के साथ सूरज नारायण सिंह भी जेल की दीवार फांद कर फरार हो गए |फरार होकर वे नेपाल की तराई में चले गए |जहां आन्दोलन के कार्यक्रमों की नयी दिशा दी गयी |

जेल में अधिकारियों के द्वारा बहुत प्रताड़ना दी जाती थी | फिर भी कारावास में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ उत्साहवर्द्धक वातावरण बना रहता था |शारीरिक कष्ट के वावजूद राष्ट्रीय जागरण तथा राष्ट्र्मुक्ति की ललक का अनुभव करते हुए पुनः दुगुनी शक्ति का अनुभव करते हुए स्वतंत्रता सेनानी भारत माता की जय एवं बन्दे मातरम की नारे से जेल परिसर को गुंजायमान रखते थे |

Author: Team MithilaConnect

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