मिथिला का असुरगढ़ किला – अतीत की एक अनसुलझी पहेली

आलेख


दरभंगा जिले से 40 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में अवस्थित एक खंडहरनुमा किला है| यह खंडहरनुमा किला ५० एकड़ की भूमि पर फैला हुआ है | इसकी उत्पति के सम्बन्ध में माना जाता है कि यह किला असुर साह के द्वारा बनाया गया था जो मुस्लिमों का प्रभावशाली और शक्तिशाली मुखिया था | ऐसा मत है कि या तो उसने (असुरशाह) किला का निर्माण किया या उसका सम्पर्क सहरसा जिले में स्थित एक दूसरे किले चानुरगढ़ से सड़क मार्ग द्वारा किया |चानुरगढ़ का यह किला पूर्णतः नष्ट न होकर अभी भी कुछ हिस्सों में उपलब्ध है|असुर साह के इस किले के खँडहर की खुदाई में कुछ महत्वपूर्ण धातु और ताम्बे की टुकड़े मिले | लोगों ने इसे इकट्ठा किया और ऐसा माना जाता है कि उनलोगों ने इसे सिक्के के रूप में प्रयोग किया हुआ होगा|

असुरगढ़ किले की बनावट

A large part of Asurgarh fort falls in the way of river now

तिलजुगा नदी पहले किला की पूर्वी छोड़ होकर बहती थी जिसकी धारा से किले की पूर्वी दीवार कटी हुई प्रतीत लगती है | इसी नदी की दूसरी धारा इसके पश्चिम की तरफ से बहती है | वर्तमान में यह किला एक छोटा त्रिकोणीय स्वरूप बनकर जल विभाजित कर रही है | पश्चिमी तरफ अधिक दूरी होने के कारण नदी की धारा कमजोर हो गयी और दीवार की ईंट पानी की कमजोर धारा से नहीं कटी | दीवारों के निशान  हर जगह दिखाई देते हैं | इन विशाल दीवारों में कई अंतराल हैं जो उस समय में किले के फाटक हो सकते हैं |ऐसा प्रतीत होता है कि किला की मुख्य प्रवेश द्वार या तो दक्षिण में या गढ़गांव के चारों ओर या पूर्व में या नदी के वर्तमान जल मार्ग की ओर हो सकता है |

हालाकि किले की दीवार ज्यादा मोटी नहीं है लेकिन इसकी बुनियाद बहुत गहराई तक जाती है | किले की पूर्वी तरफ चिनाई और भूमिगत कमरों का पता चलता है जो किले के अन्दर पुरानी कुआं और भूमिगत तहखाना हो सकता है | नदी की धारा बहुत गहराई तक थी लेकिन सूखे के समय में किले की खुदाई करना एक कठिन और खतरनाक काम है | खुदाई की रूपरेखा यह स्पष्ट करता है कि इसमें जो जली हुई ईंटें मिली ठीक वैसी ही ईटें बलिराजगढ़ की खुदाई में भी मिली थी अर्थात दोनों गढ़ों की खुदाई से प्राप्त ईंटो में समानता थी | खुदाई में मिटटी के बर्तन भी पाये गयी जिसे पुरातत्व विभाग अन्वेषण के लिए ले गयी थी|

किले का इतिहास अब भी है एक पहेली

 When and how the Asurgarh fort was constructed still remains a history.

गढ़ की छोटी और अधूरी खुदाई भी लोगों के मन में इसके बारे में और जानने की जिज्ञासा उत्पन्न करती है क्योकि यह गढ़ आज भी एक पहेली बनी हुई है | गढ़ के आस पास के लोगो की मान्यता हैं  कि यह किला बहुत प्राचीन और पवित्र भूमि है जो कटाव से उनकी रक्षा करता हैं | एक किवदंती के अनुसार लगभग ६०-७० वर्ष पहले गढ़ पर कोशी नदी की बाढ़ का आक्रमण हुआ था जिसके परिणाम स्वरुप नदी का पानी कई दिनों तक लाल रहा था पर अंततः गढ़ की आत्मा का विवाह नदी की आत्मा के साथ होने के बाद और वे लोग एक समझौते के तहत वहीँ रहने लगे | दूसरी ओर , जब नदी गढ़ की पूर्वी दीवार की बुनियाद से टकरानी शुरू हुई तो इसकी ईंटे टूट-टूट कर पानी में  बह गयी | एक विश्वास यह भी है की अगर कोई गढ़ से वस्तुओं को हटाता हैं या साथ ले जाता हैं  तो उसे गढ़ की आत्मा दण्ड देती है | वैसे मिथिला के अन्य किलों की तरह यह किला भी अब नष्ट होने के क़गार पर है |

किले के निर्माण के बारे में वैसे निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता | किले का खंडहर बौद्धकालीन भी हो सकता है या उसके बाद के वर्षो में आने वाले असुर शाह द्वारा भी बनाया हो सकता है | पुरातत्व विभाग द्वारा इस स्थल के निरिक्षण और अन्वेखन से कुछ दिलचस्प एवं रोचक तथ्य सामने आ सकते हैं | 

Author: Team MithilaConnect

Team MithilaConnect provides the information and in depth details about the news , articles and events in Mithila Region of Bihar.
Follow us on Twitter , Like us on FaceBook

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *