दरभंगा महाराज के पास था विश्वस्तरीय जवाहरातों का संग्रह!

दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह को अनमोल जवाहरातों को संग्रह करने का बड़ा शौक था | सन १९४७ में लगाए गए एक अनुमान के अनुसार उस वक्त भारत में लगभग १५० विश्वस्तर के अनमोल रत्न एवं जवाहरातों का संग्रह था | बैसे ये बात सर्वविदित है कि भारत में सबसे बेहतरीन जवाहरातों का संग्रह हैदराबाद के निजाम के पास था तथा उनके बाद दूसरा स्थान बड़ौदा के गायकवाड़ को दिया जाता है |पर आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस प्रकार के विश्वस्तरीय जवाहरातों का संग्रह करने वालों में तीसरा स्थान ना तो जयपुर के राजाओ का था और ना ही ग्वालियर अथवा मैसूर के नरेशों के पास था |ये स्थान रखते थे भारत के सबसे बड़े , धनी और प्रभावशाली ज़मींदारी एस्टेट दरभंगा राज के अंतिम महाराजा कामेश्वर सिंह | सन १९५० से १९६० के दशक के सबसे अमीर और शक्तिशाली व्यक्तियों में उनका शुमार होता था |

बहुमूल्य नौलखा हार , जो शोभता था कभी दरभंगा महाराज के गले में

King Rameshwar Singh of Darbhanga  had the unique Naulakha haar

दरभंगा राज परिवार के पास जो जवाहरात थे उसमे सबसे प्रसिद्ध हार नौलखा हार था जो कि विश्व के सबसे शानदार हारों में से एक माना जाता था |मूल रूप से यह हार मराठा बाजीराव पेशवा का था जिसे उन्होंने ९ लाख रूपये में खरीदा था|इस हार में मोती , हीरा और पन्ना जड़ा हुए थे | पेशवा के बाद आनेवाले पीढ़ियों में जो भी पेशवा बने वे उस हार में एक-एक जवाहरात जोड़ते गए जिसकी कीमत बढ़ कर तब तक ९० लाख हो गयी थी | १८५७ की क्रान्ति के बाद नाना साहेब पेशवा इसे अपने साथ नेपाल ले गए और इस हार को नेपाल के राजा जंग वहादुर के हाथों बेच दिया | उन्हें इस हार को इसलिए बेचना पड़ा क्योकि उनको पास दान देने के लिए धन की आवयश्कता थी |उनके पास एक अन्य असाधारण ‘ शिरोमणि’ हार भी था जो ३ इंच लंबा था और जिसमे पन्ने जड़े हुए थे | इस हार में उन्होंने मुहर लगा रखा था जिसमे नाना साहेब को घुड़सवारी करते हुए दिखाया गया है |

नाना साहेव के हारों का संग्रह दरभंगा महाराज को कैसे हाथ लगा उसकी एक रोचक और दिलचस्प कहानी है | नेपाल के राजा जंग बहादुर राणा के बाद ये हार धीर शमशेर राणा के अधिकार में आ गया | १९०१ मे तख्ता पलट विद्रोह के बाद शमशेर राणा को नेपाल का प्रधान मंत्री पद त्यागकर पलायन करना पड़ा| उसके पास धन की कमी हो गयी | वह अपना हार बेचने के लिए दबाव में आ गये | उन्हें अपना हार 24 घंटे में ही बेचना था वो भी नकद में , पर इतने कम समय में इतने नकद रूप में हार खरीदने वाले दरभंगा राज के महाराजा रामेश्वर सिंह के अलावा और कौन हो सकते था| इस प्रकार यह दुर्लभ हार भी दरभंगा राज परिवार के पास आ गया|

महाराज कामेश्वर सिंह को भी था अनमोल रत्नों के संग्रह का शौक

Darbhanga last king Kameshwar Singh was known for his fascination for jewels

महाराज कामेश्वर सिंह शानदार जवाहरात संग्रह करने के शौक़ीन थे | दरभंगा राज परिवार ने जर्मनी के लिपजिंग शहर में नीलाम होने वाले रुसी जार के कई जवाहरातों को खरीदा था |महाराज कामेश्वर सिंह ने इन हारों को लाखों रूपये में खरीद कर भारत लाया जहाँ यह हार १९६० तक रहा |

महान मुग़ल पन्ना था राजपरिवार का दूसरा सबसे बड़ा संग्रह

Raj Kunmar Vishwaeshwar Singh wearing the rare - Great Mughal Emerald

महाराज कामेश्वर सिंह के अनुज कुमार विश्वेश्वर सिंह द्वारा पहना गया हार जो इस चित्र में दिख रहा है वह राज परिवार संकलित महान मुग़ल कालीन पन्ना है जो कि विश्व का सबसे बड़ा नक्काशी किया हुआ पन्ना का हार था | इसका वजन २१७ कैरेट था और यह दो इंच लंबा था |यह १.७५ इंच चौड़ा और डेढ़ इंच मोटा था | मूल रूप से पन्ने के हार पर कुरान के छंदों से नक्कासी किया हुआ था | यह हार राज परिवार के पाह कैसे आया , इसके पीछे भी एक कहानी है | १९०० ई० के पूर्व कुचबिहार के महाराजा दरभंगा के महाराजा से कर्ज में बड़ी रकम ली हुई थी जिसके एवज में उन्होंने दरभंगा महाराज के पास पन्ना बंधक रखा हुआ था | जब कूचबिहार के महाराजा के सचिब ऋण चुकाने के लिए दरभंगा महाराजा के पास आये और पन्ना वापस माँगा तो दरभंगा महाराजा ने उस सचिव से कहा कि जो हार दरभंगा आता है वह दरभंगा से वापस नहीं जाता है , और तब से यह बहुमूल्य पन्ना का हार दरभंगा महाराज के पास ही रह गया |

फिर कहाँ गया दरभंगा महाराज का अदभुत खजाना ?

The new york jewellery store where Darbhanga raj family used to purchase jewels

इन हारों का खजाना जो हैदराबाद के निजाम या इरान के शाहों के समकक्ष ही बेशकीमती थे 100 वर्षों तक दरभंगा राज के पास रहे | महाराजा कामेश्वर सिंह की मृत्यु १९६० ई० में हो गयी | उनके मृत्यु काल तक ये सब हार दरभंगा राज परिवार में ही रहा | उनकी मृत्यु के बाद ये सब हार दरभंगा से बाहर कैसे चला गया यह एक रोचक एवं दिलचस्प कहानी है|

इन हारों का दरभंगा आगमन की कहानी से ज्यादा रोचक इन हारों का दरभंगा से बाहर जाना है | अंतिम महाराजा की मृत्यु के बाद दरभंगा की महारानी और महाराजा के भतीजों के बीच सम्पति बिवाद चला| इन आभूषनो का बहुत बड़ा भाग बम्बई के नाना भाई ज्वेलर्स के हाथों बेच दिया गया | न्यूयार्क के प्रसिद्ध जौहरी वैन क्लीफ और आर्पेल्स को जब दरभंगा के राजघरानों के द्वारा इस बिक्री के बारे में पता चला तो उसने अपना एक सन्देश-वाहक को दरभंगा राज भेजा और उनसे अनुरोध किया हारों के खजाना यदि उनके हाथों बेचते हैं तो उन्हें दोगुना रकम मिलेगा | हारों में धोलपुर का ताज , मैरी ऐन्टोइनेट हार , नेपाल का नेकलेस और कई शानदार हीरे एवं पन्नों के टुकडे आदि महत्वपूर्ण थे | दरभंगा महाराज जब जीवित थे तब उन्होंने १९५४ ई० में न्यूयार्क के जौहरी आर्पेल्स को इन हारों के संग्रह को लिपिबद्ध करने के लिए बुलाया था| अतः आर्पेल्स इन सब हारों और उसकी एतिहासिकता के बारे में जानता था |

धीरे धीरे दरभंगा राज परिवार में सम्पति विवाद इतना बढ़ गया कि पटना हाईकोर्ट ने हारों की सूची देखने की इच्छा जताई जो दरभंगा राज के खजाने में रखा हुआ था | राज घराने में एक रजिस्टर था जिसमे राजघराने के सभी हारों की विस्तार से एक सूचि बनायी गयी था की कितना हार उनके पास था और कितना हार निकाला गया|महारानीयों द्वारा कार्य के वक्त खजाने से हार ले लिया जाता था और उपयोग करने के बाद वापस कर दिया जाता|

संदेहास्पद स्थितियों में हार और हारों का रजिस्टर खो दिया गया| फिर पटना हाईकोर्ट के आदेश पर दरभंगा राज परिवार के हारों की सूची १९५४ ई० में वैन क्लीफ और आर्पेल्स ने बनाया | साथ ही गुम हुए हारों की सूची भी कोर्ट के आदेश पर बनाया गया |किन्तु कोई यह नहीं जानता कि हार क्या हुआ |

दरभंगा का शक्तिशाली राज परिवार को कभी भारत में वैभव और समृद्धि के लिए जाना जाता था इतिहास के गर्त में खो गया है | किन्तु आज भी दरभंगा राज परिवार के जवाहरातों के लन्दन या पेरिस में नीलाम होने के खबरें आती रहती हैं |जैसे २००१ के सितम्बर में मुगलकालीन पन्ना लन्दन के क्रिस्टी नीलामी घर में बिक्री के लिए आया था |

 

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