माँ दुर्गा की स्तुति कैसे करें मैथिल विधि द्वारा !

शारदीय नवरात्रा में प्रत्येक दिन माँ की नौ स्वरूपों की पूजा होती है | विशेष कर मिथिलांचल में , देवालयों सहित प्रत्येक घरों में , माँ की पूजा अर्चना की जाती हैं | माँ की पूजा जिस दिन से शुरू होती है उस दिन को मिथिलांचल में ‘कलशस्थापन’ कहते हैं | इस दिन को माँ दुर्गा की फोटो या प्रतिमा के आगे मिट्टी के बर्तन में जौ एवं तिल को बोया जाता है तथा अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन के समय यह मिट्टी के बर्तन से निकाला जाता है इसे जयंती कहते हैं | जयंती निकालने का अर्थ होता है कि माँ दुर्गा सबको शक्ति दें और अन्न , धन और आरोग्य रहने की कृपा बनाये रखें|

जिस प्रकार से संसार की रचना ब्रम्हांड के अंधकार के गर्भ से नौ ग्रहों के रूप में हुआ , ठीक उसी प्रकार मानव जीवन की रचना भी माँ के गर्भ में नौ महीने के अंतराल में होता है | मनुष्य योनि के लिए गर्भ का यह नौ महीना नवरात्र के ही तरह होते हैं  |नवरात्र का अर्थ शिव  और शक्ति के  उस नौ दुर्गाओं के रूप से है जिन्होंने संसार को प्रारम्भकाल  से ही जीवन ऊर्जा प्रदान की है |साथ ही संसार और प्रकृति की बनावट में स्त्री शक्ति और  माता की शक्ति की प्रधानता को स्पष्ट कर दिया है |

मैथिल पूजा पाठ करने के विधि -

kalashthapan vidhi in mithila

दुर्गा माँ के विभिन्न स्वरूपों की पूजा अर्चना करने के लिए एक लकड़ी के पटरे पर लाल कपड़ा को डालकर उस पर चावल से गणेश , षोडशमातृकाओं एवं नवग्रह बनाना चाहिए |पूजा स्थल के इशान कोण में कलश की स्थापना करनी चाहिए | कलश ताम्बे या मिट्टी की ही होनी चाहिए | कलश के निचे बालू एवं गाय के गोबर के मिश्रण में जौ मिला देना चाहिए फिर पानी से उसको पुरी तरह भींगा देना चाहिए |ऐसा करने पर कलश के नीचे बहुत सुन्दर सा जौ खिल उठेंगे | जौ  के इस खिले हुए स्वरुप को जयंती कहते है |

अब लकड़ी के पटरे के उपर दो जल पत्र रखा जाना चाहिए | एक  जलपात्र में पांच पत्तों वाली आम के पल्लव लगा कर मिट्टी , चांदी या कांसे के बर्तन में घी का दीपक जलाया जाना चाहिए | कलश के नीचे तेल की ज्योति जलाया जाना चाहिए | क्योंकि तेल की ज्योति से पाप का नाश होता है और घी के दीपक जालाने से घर में खुशी एवं आनंद बना रहता है | ये दोनों ही ज्योति अखंड लगातार नौ दिनों तक जलती ही रहनी चाहिए |ताकि माँ भगवती दुर्गा हर हमेशा अपने भक्तों के सामने ही रहें |

तीसरे कलश के उपर पांच आम के पत्तों वाली पल्लव लगाया जाना चाहिए , कच्चा नारियल छीलकर स्वास्तिक का चिन्ह बना कर रखना चाहिए एवं मिट्टी के कलश के ऊपर भी पांच पत्तों वाली पल्लव रख कर नारियल को रखा जाना चाहिए | किसी अच्छे एवं विद्द्वान ब्राम्हण से नवरात्र की प्रतिपदा के दिन से पूजा पाठ कराया जाना चाहिए और यह संकल्प लेना चाहिए कि हे माँ मुझे तीनो रूपी बल की प्राप्ति हो |

अष्टमी या नवमी के दिन नौ कन्याओं  का पूजा करके उन्हें भोजन कराना चाहिए | माँ के सभी नौ रूपों को लाल रंग के वस्त्र , रोली , लाल चन्दन , सिंदूर , नया लाल साड़ी , नया लाल चुनरी , आभूषण तथा खाने पीने के सभी पदार्थ जो लाल रंग के हों वही अर्पित करना चाहिए क्योंकि लाल रंग माँ को बहुत ही पसंद है |

 

Team MithilaConnect

Team MithilaConnect Google Plus

Team Mithilaconnect Local tries hard to get you aware of news , events and information's of Mithila region.Bless US !

Add comment


Security code
Refresh

Writers Requirement

Latest Articles

मधुबनी में है मिथिला का प्रसिद्द प्रबल-सिद्धपीठ भगवती स्थान उचैठ

Ucchaith Temple Madhubani

भगवती स्थान उचैठ  मधुबनी जिला के बेनीपट्टी...

तैरते जहाज जैसा हैं भागलपुर का अजगैवीनाथ महादेव मंदिर !

Ajgaibinath Temple Story  Bhagalpur

सुल्तानगंज प्राचीन काल का एक स्थान है | जो...

पटना का दरभंगा हाउस क्यों है बेहद ख़ास !

Patna's Darbhanga house View

पटना दरभंगा हाउस राज काल के धरोहरों में से एक...

Most Read Articles

11 Most Important Historical Places In Mithila

Janki Mandir is the biggest temple of Janakpur

In modern era mithila is a virtual region...

कौन थे राजा सल्हेश ?

King Salhesh is regarded as a god by people in Mithila

राजा सल्हेश को  मधुबनी जनपदों में सर्वजातीय...

सीता की वास्तविक जन्मभूमि सीतामढ़ी है या पुनौरा ?

A View of janki temple in Sitamarhi

कहा जाता है कि  त्रेता युग में  रावण का...