There are different tattoo images based on traditions and trends

कैसे शुरू हुई मिथिला में गोदने की प्रथा !

आलेख

गोदने की प्रथा भारतवर्ष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व में ही प्राचीन काल से चली आ रही है । कुछ देशों में तो इसे व्यक्ति के साहस से जोड़  कर देखा जाता हैं क्योकि यह एक पीड़ादायक क्षणों से गुजरने जैसा है |

गोदने के आकार और  मान्यताएं

There are different tattoo images based on traditions and trends

अनेक मान्यताओं के बीच एक यह भी मान्यता है की  गोदना के कारण बुरी आत्माएं हानि नहीं पंहुचा सकती हैं | यह शरीर के अलग-अलग हिस्से पर किया जाता है – मसलनहाथों पर, बाँह पर, चेहरे पर, जंघा पर, पीठ पर, पैर के पंजों पर | वैसे भारत भर में अलग-अलग जनजातियों में भी इसका  अलग-अलग अभिप्राय होता है और विशेष अंगों पर ही गोदना अंकित किये जाते हैं।

गुदे चित्र भी अलग अलग प्रकार के होते हैं | इनमें  सूर्य, चन्द्रमा, बिच्छू, मोर, अश्व, पूल, और भी अनेकों आकृतियाँ ।वैसे  कुछ आकृतियाँ  सभी जन जातियों में प्रचलित है जैसे मोर हालाँकि चित्र भिन्न हो सकतें हैं ।

मिथिला में गोदने की परंपरा

Tattoo in Mithila

गोदना मिथिला जैसे निर्धन प्रदेशों में स्त्रियों का सस्ता और सुलभ श्रृंगार का साधन रहा है | गोदना गोदनेवाली स्त्रियाँ निम्न जातियों की होती है या बंजारन होती हैं और ये गोदना गोदने की पीड़ा को कम करने के लिए आकर्षक लोकगीत गाती हैं |

एक जनश्रुति यह भी

Start of Tattoo Tradition in Mithila

वैसे , श्रृंगार के अलावा इसकी पृष्ठभूमि में एक और जनश्रुति पाई जाती हैं मिथिला में | इसके अनुसार , डोम जाति की स्त्रियाँ एवं युवतियों को मुसलामानों एवं अन्य आक्रान्ताओं के शोषण का शिकार होना पड़ता था | उनके शोषण से बचने के लिए डोम जाति ने सूअर पालना शुरू कर दिया और गोदना गुदवाना शुरू कर दिया |

सूअर पालना इसलिए शुरू किया कि उसे मुसलमान  घृणास्पद और अस्पृश्य समझते थे | ध्यातव्य है की आरम्भ में गोदना गुदवाया गया कम आकर्षक लगने के लिए | आगे चलकर गोदना सुन्दर दिखने का और श्रृंगार का साधन बन गया |

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