गायन की एक परंपरा जिसका विकास हुआ था दरभंगा में !

आलेख


ध्रुपद संगीत भारत की एक संपन्न गायन शैली है | ध्रुपद का अर्थ होता है शैली जो नियमों  से बंधी हुई हो | यह गायन शैली भारत में सबसे पुरानी गायन शैली में से एक  मानी जाती  है |ध्रुपद शैली एक गंभीर प्रकृति का गीत है जिसे गाने पर गला और फेफड़ा पर बल लगाना पड़ता है | सम्भवतः इसलिए  लोग ध्रुपद गायन को मर्दाना गीत भी कहते हैं |

ध्रुपद की उत्पति

According to some known records Dhrupad origin dates back to 15th century by Man Singh Tomar

ध्रुपद गायन की उत्पति कब और किसने की इस सम्बन्ध में विद्द्वानों में मतभेद है | अधिकाँश विद्वानों ने माना है कि ग्वालियर के राजा मान सिंह तोमर ने इसकी रचना १५ वीं शताब्दी में की | तोमर ने ध्रुपद गायन की प्रशिक्षण देने के लिए एक स्कूल खोल रखा था | गोपाल , नायक बैजू , स्वामी हरि दास और तानसेन ही ध्रुपद गायन अकबर के समय में गाते थे | तानसेन ने स्वामी हरिदास से ध्रुपद गायन सीखा था |

वस्तुतः शास्त्रीय संगीत के  पद ख़याल और ध्रुपद की उत्पति ब्रजभूमि में हुई थी जिस कारण से इन सबकी भाषा ब्रज है |आगे चल कर मुग़ल काल में ख्याल उर्दू की शब्दाबली का प्रभाव ध्रुपद पर पड़ा | ध्रुपद की परंपरा छह सौ साल पुरानी है | यह एक मात्र ऎसी शास्त्रीय परम्परा है जिसमे नए प्रयोग हुए और रचना धर्मिता के नए आयाम जोड़े गए | लेकिन डागर परिवार ने इसकी शास्त्रीय शुद्धता को बरकरार रखा और इसका प्रसार किया |ध्रुपद गायन की चार बानियाँ मानी जाती थी |इन बानियों के नाम थे- गोउहार बानी , खंडार बानी , नौहार और डान्गूर बानी | ध्रुपद गायन के प्रमुख गायकों का नाम हैं – जिया फरीदुद्दीन डांगर और पंडित राम चतुर मल्लिक | जिया फरिउद्दीन डागर का जन्म राजस्थान के उदयपुर में हुआ था |

दरभंगा घराना और पंडित राम चतुर मल्लिक

Ram Chatur Mallick popularised Darbhanga Tradition of Drupad to epitome

पंडित राम चतुर मल्लिक , जिनको लोग प्रेम और आदर से  से ‘पंडित जी’ कहते थे ,  को दरभंगा घराना की शोहरत को बुलंदियों तक पहुचाने का श्रेय जाता है | उनका जन्म बिहार के दरभंगा जिले के अंतर्गत अमता  गाँव में ५ अक्तूबर १९९२ ई० को हुआ था | कहा जाता है कि पंडित राम चतुर मल्लिक के पूर्वज राजस्थान से यहाँ आकर बस गए थे और संगीत में प्रतिष्ठित ‘ दरभंगा घराना’ की स्थापना किये थे |

पंडित राम चतुर मल्लिक के  पिता  दरभंगा महाराज के दरबार में एक संगीतग्य थे | राम चतुर की प्रारंभिक संगीत शिक्षा अपने चाचा क्षितिज मल्लिक से मिली थी | उसके बाद की प्रारम्भिक शास्त्रीय शिक्षा सितार वादक रामेश्वर पाठक से ग्रहण की थी | १९२४ ई० में दरभंगा के महाराज ने इन्हें राज दरबारी नियुक्त किया | १९३७ ई० में दरभंगा के महाराजाधिराज कामेश्वर सिंह के छोटे भाई विशेश्वर सिंह के साथ इंग्लैण्ड और फ्रांस गए और वहां अपनी शास्त्रीय संगीत से श्रोताओं को मुग्ध कर दिया | वे ठुमरी गायन में भी निपुण थे | १९७६ ई० में फ्रांस सरकार ने राम चतुर मल्लिक के ध्रुपद-धमार के रेकर्ड को यूनेस्को प्रसारण के लिए चुना था |१९९१ई० में पंडित राम चतुर मल्लिक मृत्यु हो गयी |

दरभंगा घराना की विशिष्टता 

संगीत के क्षेत्र में घराना प्रणाली को बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है | घरानों से तात्पर्य किसी ऐसी विशिष्ट गुरु शिष्य परम्परा से है , जिसकी अपनी ख़ास एवं सुव्यवस्थित कलात्मक शैली हो | गायन के अंतर्गत ध्रुपद , ख्याल एवं ठुमरी के घराने स्थापित हुए | घराना गुरु और शिष्य के संयोग से बनता है | इस प्रकार श्रेष्ठ गुरु एवं प्रतिभाशाली शिष्य के सानिध्य से घराने का सुव्यवस्थित अस्तित्व सामने आया |घराना प्रणाली भारतीय संगीत को और धनी बनाया | दरभंगा घराने की पहचान बनाने में साथ ही देश-विदेश में दरभंगा घराने की गायकी को विकसित करने में स्व० पंडित विदुर मल्लिक का बड़ा योगदान रहा है |

दरभंगा घराना हमारे भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्राचीन ध्रुपद संगीत परम्परा है | करीब ४५० वर्ष से भी अधिक पुराने एवं १३ पीढ़ी से संगीत विरासत की धरोहर को सफलतापुर्बक निरबाह कर रही है | ध्रुपद संगीत का एक प्राचीन घराना जिसमे खंडारबानी और गोबर्हारबानी की गायन शैली सुनने को मिलती है | दरभंगा घराना की विशेषता है कि चार पद गायन शैली जिसमे ध्रुपद के अतिरिक्त ख़याल , ठुमरी , दादरा , लोक संगीत तथा विद्यापति द्वारा लिखित पद को ठुमरी एवं भजन अंग में पेश करना |

दरभंगा घराना की नयी पीढ़ी

The new generation from mallick's family in Darbhanga Gharana

प्रशांत  और निशांत मल्लिक जो की ‘ मल्लिक बन्धु ‘  के नाम से चर्चित हैं , इस परंपरा के नए वाहक हैं | दरभंगा घराना के आधार स्तम्भ , ‘मल्लिक कुनबे’ ,  की यह  १३ वी पीढ़ी भारतीय संगीत में ध्रुपद शैली की बेहतरीन जोड़ी मानी जाती है | अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित यह जोड़ी विभिन्न गायन उत्सवों पर ध्रुपद गायन की इस शैली का जौहर दिखातें ही रहतें हैं | वे अनेकों भारतीय संगीत शैली की जन्मभूमि  इलाहबाद शहर  में रहतें हैं |

Author: Team MithilaConnect

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