इस योद्धा ने मिथिला को बनाया था एक शक्तिशाली राज्य !

Warrior King of Mithila - Shiv Singh

महाराज शिवसिंह गरुड़ नारायण महाराज देव सिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे | उनके पिता की मृत्यु १४०२ ई० में हो गयी | पिता की मृत्यु के बाद शिवसिंह मिथिला के राजा बने | उस समय शिवसिंह मात्र १५ वर्ष के थे | युवराज शिवसिंह  प्रतापी , उदार और विद्वान्  थे | उन्होंने  बहुतों  धर्म ग्रन्थों का संग्रह करवाया ,  वे चतुरग्नि विधान का महादान पति तथा जलाश्योत्सर्ग पति स्वयं  निर्माण की | महाराजा शिवसिंग अपने पिता देवसिंह से स्वर्णतुला महादान तथा गजरथ (महादान) कराया | कहते हैं महाराज शिवसिंह बहुत ही सुन्दर थे |वे  अपनी सौन्दर्यता के कारण रूप नारायण नाम से भी प्रसिद्ध थे |

मिथिला के विशाल भूभाग पर था शिव सिंह का प्रभुत्व

महाराजा शिवसिंह बड़े योद्धा और प्रतापी राजाओं में गिना जाता हैं | उन्होंने  तत्कालीन बादशाह को शाही कर देना बंद कर दिया | जिस कारण बादशाही सेना से बहुत युद्ध हुए | बहुत बार उनकी विजय हुई | लेकिन अंत में बादशाही सेना उन्हें पकड़ कर दिल्ली ले गई |वहां कुछ दिन तक शिवसिंह को बादशाह के अधीन रहना पड़ा |

कुछ दिनों के बाद उनके मित्र तथा मंत्री विद्यापति ठाकुर ने दिल्ली गए | विद्यापति को मैथिलि साहित्य में शेक्सपीयर जैसा दर्जा प्राप्त है | उन्होंने ने  अपनी योग्यता से बादशाह को बहुत ही प्रभावित किया | बादशाह विद्यापति ठाकूर पर बहुत खुश हुआ | जिसके बदले में उन्होंने शिवसिंह को बादशाह की कैद से मुक्त कराया | बादशाह की आज्ञा अनुसार अधीनता स्वीकार कर युवराज शिवसिंह ने मिथिला आकर माता-पिता और अन्य राजकीय लोगों को प्रसन्न किया और गौड़ की राजा से युद्ध कर उनके राज्य का कुछ भाग अपने अधिकार में ले लिया |

शिव सिंह के शासनकाल में मिथिला राज्य बहुत विशाल और परिष्कृत हो गया |

 

पत्नी लखिमा का भी है इतिहास में उल्लेख

महाराजा शिवसिंह की छः विवाहित स्त्रियाँ थी | इन सब पत्नियों में लखिमा जो लखिमा ठकुराइन के नाम  से प्रसिद्ध है , कुल , शील , विद्या आदि गुणों में लखिमा सर्वोपरि थी | अतः शिवसिंह की उनमे विशेष प्रीति थी |उनके बनाए अनेक श्लोक पंडित मंडली में प्रसिद्ध है | वह काव्य साहित्य में अति निपुण विदुषी थी | शिवसिंह के छोटे भाई पद्म सिंह की एक स्त्री विश्वासदेवी थी |

 

दुरुस्त थी शासन व्यवस्था उनके राज्य में

शिवसिंह के द्वारा खुद्बाई गयी पोखरि  वारि भरौरा आदि में राजोरवरि नाम से विख्यात है | शिवसिंह के द्वारा बनाई गई सड़कें खासकर शिवसिंह पुर से राजवारा घोड़-दौड़ तक सभी सड़कें एकदम सुदृढ़ थे |

उनके समय में जब मिथिला बहुत ही शक्तिशाली राज्य बन कर उभरा तो महाराजा शिवसिंह ने तत्कालीन बादशाह को कर (टैक्स) देना बंद कर दिया | कर नहीं देना के कारण बादशाही  सेना ने मिथिला पर फिर आक्रमण कर दी | मिथिला की सेना ने बादशाही सेना से डट कर मुकाबला की |

उसी समय से बिहार की नबाब के साथ महाराजा शिवसिंह की खट-पट शुरू हो गयी | फिर शिवसिंह ने शिवसिंहपुर छोड़कर छोटा रजवाड़ा में रहने लगे|जिस कारण बादशाह ने गुस्से में आकर अनेको बार तिरहुत पर चढ़ाई किया |

 

पराजय के पश्चात

राजा शिवसिंह की परम निजी मित्र जिसका का नाम पुरादित्य था | वह नेपाल की तराई में रजा बनौली ग्राम में सप्तरी परगना का राजा था | इस बार शिवसिंह ने अपनी सभी रानियों को विद्यापति ठाकुर के साथ अपने मित्र के पास भेजा | पुरादित्य राजा ने सभी रानियों को सम्मान पूर्वक रक्षा की || इधर शिवसिंह की सेना का बादशाही सेना के साथ बहुत दिन तक भयंकर युद्ध चलता रहा | अंत में महाराजा शिवसिंह की हार हो गयी | उनके सम्पूर्ण राज्य पर बादशाही सेना का अधिकार हो गया | राजा शिवसिंह जंगल में चले गए | इस प्रकार महाराजा शिवसिंह का शासनकाल १४१२ ई० से १४१६ई० तक रहा |

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