Cultural relations between mithila and braj

मिथिला वासी और ब्रजवासी के पारस्परिक संबंधों की पुनर्स्थापना

आलेख

मुग़ल शासक औरंगजेब ने मिथिला सहित सम्पूर्ण भारत वर्ष पर अपने शासन काल में अत्याचार किया और उसके अत्याचार एवं असहिष्णुता के कारण बहुतों मिथिलावासी मिथिला से पलायन कर अन्य प्रदेशों में जा कर बस गए | ब्रज प्रदेश में रहने वाले प्रवासी मैथिलों का एवं मिथिला वासी मैथिलों का आवागमन भी बंद हो गया |ऐसा १६५८ ई० से लेकर १८५७ की क्रान्ति तक चलता रहा |

Cultural relations between mithila and braj

संबंधों के पुनर्स्थापना का प्रथम प्रयास

१८५७ के बाद भारतीय समाज सुधारकों ने एक आज़ाद भारत का सपना देखा था | मिथिला के ब्राम्हण समाज भी स्वतंत्र भारत का सपना देखने लगे | ‘स्वामी ब्रम्हानंद सरस्वती’ ने ठीक इसी वक्त जाति उत्थान का आवाज बुलंद किया | उन्होंने जाति उद्धार हेतु सम्पूर्ण भारतवर्ष में बसे मिथिला वासियों से सम्पर्क किया | जिसका परिणाम यह हुआ कि औरंगजेब के शासन काल में मिथिला वासी और प्रवासी मैथिलों के बीच जो सम्बन्ध टूट गए थे वह फिर चालु हो गया | उन्हीं के प्रयास से अलीगढ़ के मैथिल ब्राम्हणों का मिथिला जाना और मिथिला बासियों का  अलीगढ़ आना सम्भव हुआ |

स्वामी जी कुछ दिन तक तो गृहस्थ आश्रम में बिताये फिर सन्यासी बन गए | सन्यासी के रूप में वे देश में घूमते हुए जातिय उत्थान का कार्य करने लगे | इसी क्रम में वे मिथिला भी आये और मिथिला से वापस आकर वे अलीगढ़ में मैथिल सिद्धांत सभा आयोजित की | इसी समय से अर्थात १८८२ ई० से स्वामी जी जाति सेवा में लग गए | सिद्धांत सभा के कार्यकर्ताओं तथा मिथिला वासी रुन्ना झा के बीच १८८२ एवं १८८६ के बीच पत्र व्यवहार आरम्भ हुआ |

अलीगढ में आगमन

सिद्धांत सभा के कार्यकर्ताओं के द्वारा दरभंगा के पंजीकारों को अलीगढ़ बुलाया गया | अलीगढ़ निवासियों को अपने वीजी , मूलग्राम गोत्र की जानकारी थी , उन्होंने प्न्जिकारों द्वारा उतीरे चढ़वाई |अब मिथिला के पंजीकार प्रत्येक वर्ष अलीगढ़ जाने लगे जिसके परिणामस्वरूप यहाँ के प्रवासी मैथिलों और मिथिला बासियों के बीच सम्बन्ध और मधुर होते चले गए | पंडित बवुए मिश्र  और पंडित जगदीश झा जो दरभंगा के प्रसिद्ध पंजीकार थे एकबार अलीगढ़ आये| उन्होंने उतीड़े चढ़ाई | पंडित जगदीश झा का पत्र व्यबहार भी काफी दिनों तक जारी रहा|

और वे समय -समय पर अलीगढ़ आते रहे |

स्वामी जी के प्रेरणा से अलीगढ़ में एक मैथिल ब्राम्हण पाठशाला भी स्थापित की गयी | स्वामी जी ने मिथिला के योग्य अध्यापकों की नियुक्ति उस विद्द्यालय में किया | जो व्यक्ति अध्यापक नियुक्ति किये गए थे उनमे से केहरा निवासी पंडित गेंदालाल झा , पंडित क्षमानाथ मिश्र और पंडित खेदन मिश्र प्रमुख थे | १९वीं शताव्दी में मिथिला के पंजीकारों और विद्द्वानों के अतिरिक्त महाराजा दरभंगा भी कई बार अलीगढ़ आये | इस प्रकार १८वीं शताब्दी में विछिन्न हुए सम्बन्ध १९वी शताब्दी में फिर से स्थापित हो गये  |ब्रजवासियों काका मिथिला जाना एवं मिथिला वासियों का ब्रज अना फिर से शुरू हो गया |

पारस्परिक संबंधों की पुनर्स्थापना

इसके बाद मिथिला के अनेक पंजीकार एवं विद्वान् ब्रज क्षेत्र में आते रहे | इनके आने जाने से ब्रज प्रवासी मैथिलों के सम्बन्ध मिथिला वासियों से घनिष्ट हो गए तथा यहाँ के अनेको व्यक्ति मिथिला गए |सन १९९० ई० में मधुबनी की विराट सभा में ब्रज क्षेत्र से पंडित चुन्नी लाल झा , पंडित रामचंद्र ठाकुर एवं बुधसागर झा शामिल हुए |मिथिला के राजनीतिज्ञों में प्रधान श्री गंगा नन्द सिंह सं १९३३ ई० में अलीगढ़ आकर मैथिल ब्राम्हण पाठशाला के वार्षिक अधिवेशन का सभापतित्व किया था | १९४४ ई० में मैथिलि के प्रसिद्द लेखक पंडित शशिनाथ चौधरी ने इस पाठशाला के वार्षिक उत्सव कका सभापति का पद सम्भाला था |श्री ब्रजस्थ मैथिल ब्राम्हण महा सम्मेलन आगरा एवं अजमेर के महाराजा दरभंगा श्री कामेश्वर सिंह सभापति रहे | इनके साथ राज पंडित बलदेव मिश्र , अखिल भारतीय मैथिल महासभा के महामंत्री राय बहादुर शिवशंकर झा एडवोकेट एवं उद्धट विद्वान् पंडित सीताराम झा पधारे थे |यहाँ से भी पंडित हरगोविंद मिश्र , पंडित फुल चन्द्र मिश्र महाराज से मिले थे |

इनके अतिरिक्त ब्रज्स्थ मैथिल ब्राम्हण महा सम्मलेन के प्रधान पंडित कांती प्रसाद मिश्र , पंडित ब्रजमोहन झा ने मिथिला का भ्रमण किया था | पंडित चुन्नी लाल झा की मैथिल अन्वेखन पुस्तक के आधार पर अलीगढ़ के अनेक व्यक्तियों का मिथिला वासियों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हुआ था |इस प्रकार मिथिला वासियों एवं एवं ब्रज वासियों का आवागमन प्रारम्भ हुआ तथा पारस्परिक सम्बन्धों की स्थापना हुई |

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