A potter artisan in Darbhanga giving final touches to the idols of Lakshmi Ganesh before Diwali

दीपावली – कैसे होती है मिथिला में देवी लक्ष्मी की पूजा !

आलेख

A potter artisan in Darbhanga giving final touches to the idols of Lakshmi Ganesh before Diwali

दीपावली मिथिला सहित भारत के मुख्य त्योहारों में से एक प्रसिद्ध त्यौहार है | इस पर्व को देश -विदेश में हिन्दू धर्म के मानने वाले लोग धूम धाम से मनाते हैं | यह वास्तव में एक प्रकाश का पर्व है | यह पर्व अन्धकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है | मन में अन्धकार  रूपी अहंकार को ज्ञान रूपी प्रकाश से दूर किया जाता  है |इस दिन माँ लक्ष्मी की पूजा की जाती है | इस वर्ष दीपावली ३० अक्तूबर को मनाई जा रही है |

क्यों मानते हैं हम दिवाली !

कहा जाता है कि भगवान् राम कार्तिक अमावश्या के दिन असुर रावण को मारकर चौदह वर्ष के बाद अयोध्या से लौटे तो अयोध्या वासियों ने अपने – अपने घरों में दीपक जला कर उनका स्वागत किया था | इसी याद में लोग प्रत्येक वर्ष दीपावली पर्व मनाते हैं |

इसे सिखों के छठे गुरु श्री हर गोबिंद जी के रिहाई की ख़ुशी में भी मनाया जाता है | इसी दिन जहांगीर ने ग्वालियर जेल से हरगोबिन्द जी को रिहा किया था | कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का कहना है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने अत्याचारी राजा नरकासुर को मार गिराया था |

जिसके कारण प्रजा में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी और लोगों ने अपने घरों में घी के दीये जलाए | माता लक्ष्मी का जन्म भी इसी दिन समुद्र मंथन से हुआ था | इतना ही नहीं भगवान् विष्णु ने हिरण्यकश्यप का इसी दिन वध किया था |

पूजा काल का सबसे उत्तम मुहूर्त

वैसे तो माँ लक्ष्मी की पूजा दीपावली के दिन प्रदोषकाल में ही होती है | लोगों का मानना है कि प्रदोष काल में माँ लक्ष्मी की पूजा करने से साधक की घर-परिवार की दरिद्रता दूर होती है | इस दिवाली के प्रदोष काल का समय शाम ५ बजकर ४२ मिनट से लेकर ८ बजकर १७ मिनट तक है | इसी प्रदोषकाल के भीतर माँ लक्ष्मी की पूजा की जानी चाहिए |

वैसे लक्ष्मी पूजा का सर्व श्रेष्ठ समय इस दीपावली के दिन मात्र १३ मिनट अर्थात संध्या ६ बजकर ५० मिनट से लेकर ७ बजकर ३ मिनट ही है |क्योकि प्रदोषकाल , स्थिर लग्न एवं कुम्भ का स्थिर नवांश एक साथ इसी बीच है | अतः पूजा का यह समय अति उत्तम है |

इस बार महा निशा काल पूजा मुहूर्त है रात के ११ बजकर ३८ मिनट से लेकर १२ बजकर ३० मिनट तक |

कैसी हो आपकी पूजन विधि

सर्वप्रथम पूजा करने वाले को को कार्तिक कृष्णपक्ष अमावश्या के दिन प्रातः काल अपने दैनिक नित्य क्रिया कर्म से निवृत होकर स्नान कर बिना कुछ खाए घर के सभी देवी देवताओं की पूजा करनी चाहिए एवं उस दिन व्रत रखना चाहिए |

शाम ढलते ही एक छोटा सा चौकी पर नया वस्त्र रख कर उस पर रंगीन अरवा चावल से स्वास्तिक का चिन्ह बना कर उस पर लक्ष्मी गणेश की नयी प्रतिमा स्थापित की जानी चाहिए |

प्रतिमा के सामने जल से भरा हुआ कलश जिसपर नए लाल या पीले वस्त्र में लपेटा हुआ नारियल एवं उसके उपर एक घी या तील के तेल से जलता हुआ दिया रखना चाहिये |

कलश के नीचे भी थोड़ा सा अरबा  चावल रख देना चाहिए |

कैसे कारें  माता लक्ष्मी का ध्यान

पूजा करने वाले को नए वस्त्र पहन कर लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा के सम्मुख बैठ कर दोनों हाथ जोड़ कर निम्न लिखित मन्त्र पढ़ते हुए उनका ध्यान करना चाहिए –

या सा पद्द्यासनस्था विपुल- कति तटी पद्य पत्रायताक्षी

गम्भीरार्तव- नाभिः स्तन भर नमिता शुभ्र वास्त्रोत्तरीया |

या लक्ष्मीर्दिव्य रुपैर्मनी गण खचितैह स्वापिता हेम कुम्भैह

सा नित्यं पद्द्म-हस्ता मम वसतु गृहे सर्व मांगल्य- युक्ता ||

उसके बाद जल से अपने शरीर को निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए शिक्त कर  परिवार के अन्य सदस्यों को भी जल से शिक्त करना चाहिए |

साथ ही घर और घर के बाहर भी जल से शिक्त करना चाहिए –

ॐ पवित्रः अपवित्रो वा सर्वास्थांगतोपिवा |

यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स वाहाभ्यंतर शुचिः||

पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुप्रिष्ठः ग शि सुटलं छन्दः |

कुर्मोदेवता आसने विनियोगः ||

फिर वापस पूजा की आसन पर आकर माँ लक्ष्मी की आवाहन करना चाहिए |

माँ लक्ष्मी का आवाहन

माँ लक्ष्मी की ओर बैठ कर दोनों हाथ जोड़ते हुए उनका ध्यान करते हुए आवाहन करना चाहिए कि हे देवी मैं आपको आवाहन करता हूँ | आप मेरी पूजा स्वीकार करें |

इसके बाद ॐ माधवाय नमः ,  ॐ केशवाय नमः और ॐ नारानाय नमः मन्त्र पढ़ते हुए गंगाजल से आचमन करना चाहिये |

आचमन करने से विद्या तत्व , आत्म तत्व एवं बुद्धि तत्व का शोधन हो जाता है |

ध्यान एवं संकल्प की विधि

आचमन के बाद दोनों आँख बंद कर माँ लक्ष्मी का साकार रूप का ध्यान करना चाहिए | इसके बाद हाथ में जल , अक्षत एवं कुछ द्रव्य लेकर संकल्प करना चाहिए कि मैं अपना नाम , जगह एवं समय पर लक्ष्मी , गणेश , सरस्वती का पूजा शुरू कर रहा हूँ ,  इसलिए मुझे शास्त्रोक्त फल प्राप्त हो |

तत्पश्चात गणेश जी एवं माँ गौरी की पूजा करना चाहिए और इसके बाद कलश की पूजा अर्थात बरुण देब की पूजा की जानी चाहिए |उसके बाद नवग्रह की पूजा होनी चाहिए | हाथ में अक्षत और फुल लेकर नवग्रह स्त्रोत का पाठ साधक को करना चाहिए |

इसके बाद साधक भगवती षोडश मातृका पूजा किया जाता है | मातृका पूजा के बाद माँ लक्ष्मी , गौरी , सरस्वती एवं गणेश जी को मौली अर्पण करना चाहिए एवं साधक को स्वयं भी दाहिने हाथ में बाँध लेना चाहिये |

फिर सभी देवी देवता को तिलक लगाकर स्वयं भी लगाना चाहिए |

पूजा

फिर लक्ष्मी और गणेश की पूजा की जानी चाहिए | लक्ष्मी जी के प्रतिमा के सामने ७ , ११ या २१ दीपक जलाना चाहिए साथ ही माँ को श्रींगार सम्बन्धी वस्तु अर्पण करना चाहिए |

लक्ष्मी जी को खुस करने के लिए श्री सूक्त , लक्ष्मी सूक्त और कनकधारा स्त्रोत का पाठ करना चाहिए |

इसके बाद माँ लक्ष्मी से निम्न मन्त्र पढ़ते हुए क्षमा मांग लेनी चाहिए –

अपराध शहस्त्रानि क्रियन्ते हर्निश मया दासो मा  मत्वां  क्षमस्व परमेश्वरी ,

आवाहन ना जानामि ना जानामि विशर्जनम , पूजा चैव ना जानामि क्षम्यतां परमेश्वरी

मन्त्र हीनं क्रिया हीनं भक्ति हीनं सुरेश्वरी ,यति पूजनं मया देवि परिपुर्नं तदस्तु में  |

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोचरेत या गतिं सापरोधिस्म शरनं प्रापस्त्वांग जगदम्बेति चोचरेत |

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