कुप्रथा पर हास्यलेख द्वारा चोट करते थे डा. हरिमोहन झा

आलेख


हरिमोहन झा को मैथिलि सहिया जगत में ‘ हास्य और व्यंग के सम्राट ‘ के रूप में जाना जाता है | उनके मशहुर पात्र ‘खट्टर काका’ ने उन्हें बेहद प्रसिद्धि दिलाई थी |

मैथिली साहित्य के इस  विशिष्ट , आधुनिक एवं प्रसिद्ध लेखक थे  ने अपनी कृतियों द्वारा मिथिलांचल समाज में व्याप्त अंधविश्वास , रुढ़िबाद , अशिक्षा , रीति रवाज एवं प्रदाप्रथा पर करारा प्रहार किया |

उनका जन्म वैशाली जिला के कुमर वाजित पुर गाँव में १८ सितम्बर १९०८ ई० में हुआ था | दर्शन शास्त्र में एम०ए० करने के बाद उन्होंने बी०एन० कालेज , पटना कालेज एवं पटना विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया |

सामाजिक बुराई को उजागर किया

लोकप्रिय साहित्यकार हरिमोहन झा को 'खट्टर काका' ने मैथिल जनमानस में पहचान दी

मैथिली में उत्कृष्ठ कार्य के लिए हास्य के अवतार और मैथिली गद्य का विद्यापति माना गया है |वे अपनी बौद्धिक कुशाग्रता और विलक्षण प्रतिभा के लिए निश्चित रूप से प्रशंसनीय हैं | उनकी हास्य कहानियाँ सुन कर लोगों पर एक अनुकूल  चिकित्सीय प्रभाव पड़ता है |

पेशे से वे एक दार्शनिक थे , आमतौर पर अपनी उदारता के लिए जाने जाते थे |यह भी आश्चर्य की बात है कि एक दार्शनिक होते हुए भी वे अवरोधों की दुनियां में रहकर कथानक , पात्रों एवं घटनाओं का चित्रण बहुत ही ठोस रूप से किया |

एक दर्शनशास्त्र प्रोफेसर अपने जीवन में गंभीरता के लिए जाना जाता है लेकिन उनके बारे में ऐसा कहना एक ठिठोलिया है |साहित्य की दुनिया में संभवतः  बर्नार्ड शा ,  हिलेरी बलोक , मार्क ट्वैन  और  ईव्लिन वफ़ सरीखें हैं |

अंग्रेजी के भी जानकार

हरिमोहन झा का व्यक्तित्व पूर्वी एवं पश्चिमी संस्कृति का मिश्रण था | उन्हें जो विरासत में मिली वह  था उनका पारिवारिक और सामाजिक जीवन | वे संस्कृत और अंग्रेजी में भी निपुण थे |

प्रो हरिमोहक झा ने पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन किया था | अपने बी० ए० की ट्यूशन फीस के लिए उन्होंने ने तीस दिन में संस्कृत एवं संस्कृत अनुबाद चंद्रिका पुस्तक लिखा |उनकी संस्कृत व्यायाकरण एवं संस्कृत अनुबाद पुस्तक अन्य पुस्तकों की तुलना में उत्तम है |

भारतीय दर्शनशात्र में भाषाई विश्लेषण में उनका बहुत बड़ा योगदान है | जिसके लिए उन्हें प्रशंसित भी किया गया था | विदेशों में अंग्रेजी बोलने में उन्हें प्रबीणता हासिल थी |

उनके व्यक्तित्व में दो उपभेद थे – प्राच्य और पाश्चात्य , प्राचीनता और आधुनिकता , अतीत और प्रगति एक ही लक्ष्य की दिशा में जीवन को बेहतर और सार्थक बनाके लिए एक दुसरे के विरुद्ध खड़े रहते हैं |उन्होंने मिथिला की पारम्परिक मूल्यों और सांस्कृतिक समृधि को जीवित किया था | लेकिन उन्होंने सामाजिक , धार्मिक और नैतिक बनाबट में पाखण्ड और अहंकार की बहुत बड़े पैमाने पर आलोचना की थी | वे आधुनिकतावादी और वर्तमान दौर में जीवन के लिए समय के साथ तालमेल रखने विश्वास रखते थे |

प्रो० झा अपनी बहुमुखी प्रतिभा को खुद अपनी उपन्यासों , लघु कहानियों , नाटकों , संस्मरणों और कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया था |सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपनी पुस्तक खट्टर काका के तरंग में एक रचनात्मक नयी शैली का वर्णन किया है जो कि अन्य साहित्य में नहीं है ऐसा उसने साबित कर दिया है |

प्रो० झा की चयनित कहानियां साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित की गयी है | राज मोहन झा ने उनकी कहानियों को चार भागों में बांटा है

(१) हास्य और व्यंग्य कथा

(२) गंभीर व्यंग्य कथा

(३) बिनोदी कहानियाँ और

(४) भावनात्मक और करुणामयी कहानियाँ |

बाल-विवाह का विरोध 

पंच-पत्र कहानी प्रो० झा की बहु-आयामी कला की एक अद्भुत उदाहरण है | जिसमे उन्होंने एक मध्यम वर्गीय संस्कृत शिक्षक की आशाओं और आकांक्षाओं , दुःख और कष्टों का चित्रण किया है |

उन्होंने अपनी दुसरी पुस्तक ‘कन्याक जीवन’ में एक बाल विधवा का बहुत ही कारुणिक एवं मार्मिक जीवन का चित्रण किया है |

चौदह वर्ष की उम्र में ही एक लड़की की शादी कर  दी जाती है | जो कुछ दिनों के बाद विधवा हो जाती है |वो भी अपने माँ बाप पर बोझ बन जाती है जसके घर में और दो लडकियां बिबाह करने लायक रहती है |किस तरह वह अपने शरीर को एक फटी हुई साड़ी से ढक कर रखती है | अर्थात उन्होंने अपने इस कहानी के माध्यम से बाल बिबाह का बिरोध किया है |

आधुनिकतावाद पर जोर

उन्होंने अपनी अगली तीन कहानियों के माध्यम से मैथिल समाज में चली आ रही पर्दा प्रथा , अशिक्षा एवं रूढ़ीबादी बिचारधारा का पुरजोर विरोध किया है |

उनकी तीन कहानिया इस परिद्रेश्य में बेहद महत्वपूर्ण है ये हैं – मर्यादाक भंग , ग्राम सेविका और ग्रेजुएट पुतोहू |

मर्यादाक भंग कहानी में बुजुर्ग औरतें पर्दा प्रथा एबं रूढ़िवादी विचारधारा के कारण आतिथ्य सत्कार नहीं कर पाती हैं जबकि उसी घर में एक शिक्षित महिला हैं जो उस आतिथी को निःसंकोच स्वागत करती हैं |

ग्राम सेविका कहानी में एक सेविका जो निःस्वार्थ भाव से पुरे समाज की सेवा करती है जिसके कारण वह पुरे गाँव में लोकप्रिय हो जाती है और

ग्रेजुएट पुतोहू नामक कहानी में उन्होंने एक स्वतंत्र विचारधारा वाली बहु का चित्रण किया है जिसे अपनी पति के घर में किन किन स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा |

क्योंकि उसकी चाल चलन , व्यवहार , खुला बिचार किसी को पसंद नहीं था | लेकिन  सर्प दंश से उसकी मृत्यु हो जाने पर उसकी बिचारधारा ने एक सामाजिक करान क्रान्ति ला दिया |

Author: Team MithilaConnect

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