राजा , जिनके वैभव से इन्द्र भी करते थे ईर्ष्या !

आलेख


कहा जाता है की मिथिला राज्य जो की प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदो अर्थात राज्यों में से एक था अपनी भव्यता और सम्पन्नता के लिए जाना जाता है | महान राजा जनक के धन और वैभव की चर्चा इंद्र तक को ईर्ष्या से भर देता था|

जनक का जन्म और मिथिला का उदभव

Janak's kingdom Mithila was known for posperity and wealth

जनक के पूर्वज निमि  ने एक बार बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया | जिसमे पुरोहित्य के लिए गुरु बशिष्ठ को आमंत्रण भेजा गया | लेकिन बशिष्ठ उस समय देवताओं के राजा इन्द्र के साथ यज्ञ में व्यस्त थे जिसके कारण उन्होंने निमि का आमंत्रण स्वीकार करने में असमर्थता जतायी | इधर निमि ने गौतम एवं अन्य ऋषि-मुनियों की सहायता से यज्ञ शुरू करा दिया | निमि के इस व्यवहार से गुरु बशिष्ठ बहुत क्रोधित हो गये | क्रोध में आकर बशिष्ठ ने निमि को भस्म हो जाने का शाप दे दिया प्रत्युतर में निमि ने भी बशिष्ठ को भस्म हो जाने का शाप दे दिया | जिसके फलःस्वरुप दोनों ही भस्म हो गए |

ऋषि-मुनियों ने यज्ञ की समाप्ति तक एक विशेष उपचार के द्वारा निमि के शरीर को सुरक्षित रखा | निमि को कोई सन्तान नहीं थी | देवता एवं ऋषि-मुनि इस बात से चिंतित हो गये कि निमि का राज-पाट अब कौन देखेगा | अतः उनलोगों ने अरनि से उनके मृत शरीर का मंथन किया | मंथन से एक पुत्र की प्राप्ति हुआ | यही पुत्र आगे चलकर कर  जनक कहलाया | चुकि इनका जन्म शरीर के मंथन से हुआ था , इसलिए इन्हें ‘मिथि’ भी कहा जाता है |इनका जन्म मृत शरीर से होने के कारण यही पुत्र जनक , बिना शरीर अर्थात बिना देह के जन्म लेने के कारण वैदेह और मंथन से उत्पन्न होने के कारण उस बालक का नाम ‘मिथिल’ हुआ | इसी आधार पर मिथिलापुरी की स्थापना हुई |

जनकपुत्री सीता का जन्म

Birth of Sita from an illustration in Thai Ramayan

बाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के अनुसार जनक, शीरध्वज जनक के नाम से प्रशिद्ध हुए | इसी शीरध्वज जनक के घर आदि शक्ति सीता ने जन्म लिया | एक बार मिथिला में भयंकर अकाल पड़ा चारों ओर सुखा ही सुखा पेड़ पौधे जीव जंतु सब सूखने लगे | ऋषि-मुनियों ने राजा जनक को सलाह दिया कि यदि सूखे खेत में स्वयं हल चलाएंगे तो वर्षा होगी |फिर क्या था राजा जनक स्वयं हल चलाने निकल पड़े | जब वे खेत में हल चला रहे थे तो हल एक पेटी से जा टकराया | पेटी को खेत से निकालकर खोला गया | उसमे से एक बच्ची निकली |

सिरध्वज जनक उस बच्ची को लेकर महल पहुंचे | महल में बच्ची का लालन पालन होने लगा | बच्ची जनक की पुत्री थीं इसलिए उन्हें जानकी भी कहा जाने लगा | जानकी जी बड़ी होने पर घरेलू कार्यों में माँ को भी सयोग करनी शुरू कर दी | राजा जनक के महल के एक कमरे में भगवान शिव की धनुष धरोहर के रूप में रखा हुआ था | भगवान शिव का धनुष बहुत ही भारी एवं विशाल था जिसे कोई प्राणी आजतक उठा नहीं पाया था | जानकी जी उस कमरे में रोज जाकर बाएं हाथ से शिव धनुष को उठाकर घर की सफाई किया करती थीं | राजा जनक अपनी पुत्री की इस बहादुरी एवं अदम्य साहस को देख कर आश्चर्य चकित थे |

अपनी पुत्री की बहादुरी एवं अदम्य साहस को देख कर राजा जनक ने एक शक्ति परीक्षा का आयोजन किया और घोषणा किया कि जो वीर इस शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा उसी के साथ हम अपनी पुत्री की बिवाह कर देंगे | घोषणा सुन कर सारे विश्व से बड़े – बड़े योद्धा ,राजा – महाराजा एवं राजकुमारों ने उस शक्ति परिक्षण में भाग लिया किन्तु कोई भी उस शिव धनुष को उठाने की बात तो दूर हिला भी न सका | इस शक्ति परिक्षण में अयोध्या के राजकुमार राम भी अपने गुरु के परामर्श पर भाग लिया था | जब राजकुमार राम की बारी आई तो उसने सहज ही धनुष को उठा कर उस पर प्रत्यंचा चढ़ा दिया | दरबार में उपस्थित सभी लोग इस दृश्य को देखकर खुसी से फुले नहीं समाये | राजा जनक ने अपनी पुत्री जानकी का विवाह अयोध्या के राजकुमार राम के साथ करा दी | अब जानकी जी अपने पति राम के साथ अयोध्या के वासी हो गयीं |

महान विद्वान् भी थे जनक

Born as a King , Janak lived the life of a sage

शीराध्वज जनक सिर्फ बहादुर  ही नहीं थे बल्कि वे शास्त्र और वेद के प्रकांड विद्द्वान भी थे | कोई भी ऋषि-मुनि उनसे शास्त्रार्थ में जीत नहीं पाए थे |राजा जनक अपने गुरु याज्नावाल्क्य के सबसे प्रिय शिष्य थे |शीरध्व्ज जनक  उन्नत अध्यात्म के ज्ञाता थे जिस कारण उन्हें भी राजर्षि कहा गया | यद्यपि वे मिथिला राज्य के एक कुशल शासक भी थे| मिथिला आजी की राजधानी जनकपुर थी | जो वर्तमान में नेपाल देश में अवस्थित है | उन्होंने अष्टावक्र नामक एक निबंध भी लिखा |महाकाव्यों , रामायण एवं महाभारत के अनुसार राजा जनक अपनी राजधानी जनकपुर से ही विदेह राज्य पर शासन चलाते थे | जो कि हिमालय पर्वत के तलहटी में अवस्थित था |

शीरध्वज जनक सीता के पिता थे | इतने बड़े विद्वान् होने के बावजूद भी वे सन्यासी जैसा जीवन व्यतीत करते थे |यद्यपि वे एक महान राजा थे फिर भी वे साधू संतों के साथ धार्मिक सम्बाद किया करते थे |महर्षि नारद ने भी जनक से शिक्षा ग्रहण की थी |

राम के अनुजो का विवाह

राजा जनक का एक छोटा भाई भी था जिसका नाम कुशध्वज था | वह बनारस के राजा थे | कुशध्वज की दो पुत्रियाँ थी माण्डवी और श्रुताकृति | उनके इन दोनों पुत्रियों की बिवाह भी भगवान राम के छोटे भाई भरत और शत्रुघ्न के साथ हुई |

Author: Team MithilaConnect

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