सौराठ-सभा – मैथिल ब्राह्मणों का एक सांस्कृतिक तीर्थ

आलेख


There was a time when saurat sabha was full of crowds.

सौराठ सभा मिथिला  का वह सांस्कृतिक तीर्थ है ,जहाँ विवाह योग्य वर विवाह हेतु जमा होते हैं और कन्यागत अपनी रूचि एवं सामर्थ्य के अनुसार वर की योग्यता एवं शील गुण की जांच-परख कर विवाह सम्बन्ध तय करते हैं | सौराठ-सभा,मधुबनी जिला मुख्यालय से 9 किलोमीटर पश्चिम उत्तर सौराठ गाँव में लगती है |

सौराठ सभा से लाभ

सौराठ-सभा प्रति वर्ष आखाढ़ महीने में होती है | इस सभा में न केवल मिथिलांचल बल्कि मिथिलांचल के बाहर के मैथिल ब्राम्हण भी यहाँ पहुँच कर वैवाहिक सम्बन्ध तय करते हैं | इस सभा  से मैथिल ब्राम्हणों को अनेक लाभ होते थे |यातायात की असुविधा और वर को खोजने के क्रम में होने वाले व्यय से मुक्ति मिल जाता था ,साथ ही सभी स्तर के वर एक ही स्थान पर मिल जाते थे |मिथिलांचल का प्रसिद्ध फल आम इसी समय पकता था |

सौराठ सभा का इतिहास

सौराठ-सभा शुभारम्भ ओइनवारवंशीय ब्राम्हण शासक दरभंगा महाराज क्षत्र सिंह के समय सन १८२० ई० में हुआ |कहा जाता है कि सौराठ-सभा इससे पूर्व समौल गाँव में था |समौल ग्राम निवासी पंडित धारे झा,पंजीकार महाराजा क्षत्र  सिंह के आश्रय में रहते थे |एक बार उन्हें किसी कारण वश अशौच का संवाद दरभंगा में विलम्ब से दिया गया |इसी कारण वह अशौच से निवृत होने पर उन्होंने निर्णय लिया कि अब वे समौल गाँव नहीं जायेंगे और अपने मौसेरा भाई के गाँव सौराठ में रहने का निश्चय किया |उन्होंने तरौनी गाँव निवासी हकरू गोसाई से आग्रह किया कि समौल की वैवाहिक सभा अन्यत्र स्थापित की जाय|हकरू गोसाई कुछ विलक्षण सामग्री मंगवाकर सौराठ गाँव पहुंचे और एक पीपल वृक्ष की जड़ में अपने साथ लायी सामग्री एवं खंती को गाड़ दिया |फलतः प्रति वर्ष सौराठ में ही वैवाहिक सभा होने लगी | अभी भी नक्सा एवं जमीन के कागजात में यह उल्लेखित है -शुद्धान्त में वार्षिक सभा के वास्ते दरभंगा महाराज के द्वारा प्रदत्त |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *