सिंघेश्वर मंदिर का शिवलिंग है भगवान् विष्णु स्थापित !

आलेख


Temple and Shivling at Singheshwar Mandir Madhepura
Singheshwar Mandir is a popular Hindu religious temple near Madhepura of Bihar

सिंघेश्वर स्थान  हिन्दुओं का देश में एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है | यह बिहार के मधेपुरा जिला मुख्यालय से १६ कि० मि० की दूरी पर स्थित है | इस स्थान पर  भगवान् शिव का दिव्या शिवलिंग  स्थापित है जो अपने ऐतिहासिक एवं धार्मिक महत्व के कारण बहुत प्रसिद्ध हैं |

प्रत्येक वर्ष यहाँ शिव-भक्त बड़ी संख्या में न केवल बिहार बल्कि देश  के अन्य भागों से भी आते हैं | पड़ोसी देश नेपाल से भी शिव भक्त  यहाँ भगवान् शिव की पूजा अर्चना करने आते हैं |सप्ताह के कुछ दिन जैसे रविवार , सोमवार और वुधवार श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण होता है | सिंघेश्वर स्थान पर लगने वाला महा-शिवरात्रि मेला बिहार और नेपाल के तराई में प्रसिद्ध  है |

पंडित मण्डन मिश्र और शंकराचार्य  शास्त्रार्थ स्थल

कहा जाता है कि यह धार्मिक स्थान महान श्रृंगी ऋषि का तपोभूमि हुआ करता था |इस स्थान पर यज्ञ के अवसर पर श्रृंगी ऋषि भगवान् शिव की पूजा करते थे |उस समय यहाँ सात हवन कुंड का निर्माण किया गया था |जो आज भी खंडहर के रूप में प्रतीत होता दिखाई देता है |श्रृंगी ऋषि के यहाँ निवास करने के कारण ही कालान्तर में यह सिंघेश्वर स्थान हो गया |

यह स्थान पौराणिक कालों में मूर्ति पूजा के लिए पसिद्ध रहा है | पंडित झारखंडी झा ने भागलपुर दर्पण में इस स्थान की धार्मिक पहलुओं का महिमा मण्डन किया है |  कहा जाता है कि पंडित मण्डन मिश्र और शंकराचार्य  के बीच विश्व प्रसिद्ध शास्त्रार्थ भी यहीं पर हुआ था  |

वराह पुराण में भी उल्लेख है सिंघेश्वर स्थान का

सिंघेश्वर स्थान का सन्दर्भ वराह पुराण में भी पाया गया है | उस पुराण के अनुसार इस स्थान पर घना जंगल हुआ करता था | कई मवेशी यहाँ घास चरने आया करते थे | उन मवेशियों में एक ऐसी भी गाय थी जो घास चरने के क्रम में एक ख़ास स्थान पर खड़ी होकर अपनी स्तन से प्रति दिन दूध गिरा देती थी | यह प्रति दिन की घटना थी |प्रति दिन वह गाय वहां आकर अपनी स्तन (थन) से उसी जगह पर दूध गिरा देती थी | लोग यह देख कर अचंभित थे |

एक दिन लोगों ने उस स्थान को खोदा   जहां से एक शिव लिंग मिली| लोगों ने उसी दिन से उस शिव लिंग की पूजा करनी शुरू कर दी |फिर धीरे-धीरे उस स्थान पर एक शिव मंदिर बन कर तैयार हो गया जो आगे चल कर सिंघेश्वर स्थान कहलाया | मंदिर बनबाने बाला भागलपुर का एक व्यापारी था जिसका नाम  हरि चरण चौधरी था |

सिंघेश्वर स्थान है विष्णु द्वारा स्थापित

वराह पुराण में एक दूसरी  कथा भी है जो इस प्रकार है – एक बार भगवान विष्णु , भगवान् ब्रम्हा और भगवान् इंद्र , देवों के देव महादेव से एक महत्वपूर्ण वैश्विक घटना के पहलू पर विचार विमर्श करने कैलाशपुरी गए | लेकिन भगवान् शिव अपने नन्दीश्वर के साथ  कैलाशपुरी से कहीं अज्ञात जगह चले गए थे  | शिव को वहां न पाकर वे मायूस हो गए |

इधर  शिव अपने नन्दीश्वर के साथ एक जंगल में ध्यान करने चले गए थे | अपने नंदी को एक जगह बैठाकर घने जंगल में ध्यान करने लगे | साथ ही उसने नन्दीश्वर को बता दिया था कि मेरे बारे में किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि मैं यहाँ ध्यान में लीन हूँ |ऐसा ही हुआ नन्दीश्वर एक जगह बैठ कर पहरेदारी करने लगा | ब्रम्हा , विष्णु और इंद्र शिव को खोजते-खोजते वहां पहुंच गए |  नन्दीश्वर से शिव का पता पूछा |लेकिन नन्दीश्वर ने उन लोगों को शिव का पता नहीं बताया |

शिव ने तीनों देवगणों को पहचान लिया | वे शीघ्र ही एक लम्बे सिंग बाले हिरन के रूप में आ गए |तीनों देवों ने भी उस विचित्र लम्बे सींघों वाले हिरन को देखकर शिव को पहचान लिया | वे लोग उस हिरन को पकड़ने दौड़े | इंद्र ने सिंग के उपरी भाग को पकड़ा , ब्रम्हा ने बीच भाग को जबकि विष्णु ने सिंग के जड़ को पकड़ा | अब तीनों देवगण  बहुत ही ताकत के साथ हिरन को अपनी ओर खींचा | फिर  एकाएक  वह हिरन गायब हो गया और स्वर्ग से आकाशवाणी हुई कि तुम लोग भगवान शिव को पाने में असमर्थ हो |

इंद्र के हाथ में जो सिंग का भाग था उसे स्वर्ग में इंद्र ने स्थापित कर दिया | ब्रम्हा ने भी अपने हिस्से वाले सिंग को स्वर्ग में ही स्थापित कर दिया जबकि विष्णु ने अपने हिस्से वाले सिंग को पृथ्वी पर स्थापित कर दिया |

विष्णु के द्वारा पृथ्वी के जिस स्थान पर सिंग को स्थापित किया गया वही जगह कालान्तर में सिंघेश्वर स्थान कहलाया | यही कारण है कि शिव की पूजा यहाँ वैष्णव संस्कृति से होता है |वराह पुराण के अनुसार इसकी दो सीमाएं एक मुन्द्रान्चल शिखर के उत्तर में और एक मुन्ज्वर शिखर के दक्षिण में अवस्थित है |

वर्तमान में सिंघेश्वर मंदिर का संचालन बिहार सरकार के द्वारा स्थापित ट्रस्ट के द्वारा होता है एवं मंदिर के सम्पति को सार्वजनिक घोषित कर  दिया गया है |

Author: Team MithilaConnect

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