मिथिला की संस्कृति में रची-बसी है भोज की परंपरा

आलेख


Feast served on traditional banana leaves in Mithila

किसी विशेष अवसर पर सामूहिक भोजन की परंपरा वैसे तो भारत के अनेकों हिस्सों में प्रचलित है पर अपने अनूठेपन और वृहत स्थर पर पालन होने के कारण मिथिला में भोज की परंपरा वाकई अनोखी है | यहाँ भोज को एक मायने में समाज में आपके बढ़ते रुतबे के परिपेक्ष्य में भी देखा जाता है | यानी जितना बड़ा भोज उतना ज्यादा आपका यश ! बच्चे के जन्म से लेकर विवाह तक और विदाई से लेकर मृत्योपरांत यहाँ भोज के आयोजन की अनिवार्य परंपरा है | भारत में भले ही मृत्यु भोज की प्रासंगिकता पर बहस छिड़ी हो किन्तु इससे मिथिलांचल के बहुसंख्य जन मानस पर कोई असर नहीं पड़ता |

मिथिला के  भोजों में अनेको प्रकार की सब्जिया बनाई जाती है | वो भी प्रचुर मात्रा में | भोज में समयानुकूल सब्जियां , फलों ,  मिठाइयों , दही , पापड़ एवं अन्य सामग्रियों की भरमार होती हैं | यहाँ के  भोज में दही का होना अनिवार्य है | इसके अलावा दही का वितरण सबसे अंत में किये जाने की भी परंपरा है | आपने अगर पहले भोजन कर लिया है तो भी यह अपेक्षा की जाती है की जब सभी खाकर उठने लगें तभी आप भी उठें | भोज में लोग पंक्तियों में साफ़ सुथरे दरी बिछाये गए ज़मीन पर बैठाये जातें हैं | एक और ख़ास बात यह है की पुरुष और महिला साथ बैठ कर खाने की परंपरा नहीं है | भोज खाने के बाद लोगों के बीच पान सुपाड़ी बांटने की रिवाज है |

भोज के प्रकार

मिथिलांचल में साधारणतया दो अवसरों पर बड़े भोज किये जाते हैं | एक तो उस समय जब घर में किसी लड़की या लड़का का विवाह हो , मुंडन या यग्योंपीत संस्कार हो और दूसरा जब किसी की मृत्यु हो | मृत्यु के अवसर पर होने वाले भोज को श्राद्ध भोज कहते हैं | अन्य भोज जैसे बच्चों का छठी , जन्म-दिन का भी आयोजन किया जाता है |

वैसे प्रायःछठी का भोज उतने बृहद स्तर पर नहीं होता | बच्चे की छठी में लोग अपने परिवार के सदस्य और बंधू बांधव के साथ मिलकर ही भोज करते हैं | इस दिन जिन – जिन व्यक्तियोंको भोज कराया जायेगा उसे निमंत्रण भेजा जाता है | शाम में लोग भोज खाने के लिए आते हैं | इस भोज में कचौड़ी , पुलाव , चना दाल , एक या दो सब्जी (समयानुकूल) , टमाटर की चटनी , मांस या मछली एवं अंत में दही पड़ोसा जाता है | फिर नव बच्चे को देख कर उसे सामर्थ्य के अनुसार गिफ्ट दिया जाता है | पान- सुपाड़ी लेते हुए लोग अपने-अपने घर को जाते हैं |बच्चा जैसे-जैसे बड़ा होता है उसकी उम्र भी बढती जाती है |अगल – बगल के लोगों को दिन में ही जन्म दिन का निमंत्रण भेजा जाता है | शाम को  लोग बच्चे के घर पर जुटते है | बच्चे के द्वारा केक काटा जाता है और मेहमानों में वितरण किया जाता है  | बच्चे को लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपहार देते हैं | खाना खाते हैं |  खाना खा कर लोग घर चले जाता हैं |

मुंडन का भोज

मिथिलांचल में बच्चे मुंडन के दिन से ही भोज का  प्रचलन  शूरु हो जाता है  | जिस बच्चे का जग-मुरन होता है उस घर में छागर का बलिप्रदान कुल देवता को दिया जाता है | गाँव या मोहल्ले में निमन्त्रण भेजा जाता है | लोग शाम में भोज खाने के लिये आते हैं | भोजन में भात , दाल , आलू परबल या आलू गोभी  की सब्जी , बैगन अदौड़ी , कदीमा , आलू , कच्चा केला , बैगन का तरुआ , साग , मांस एवं अंत में दही बांटा जाता है | लोग खाकर जब उठते हैं तो पान सुपारी लेकर घर जाते हैं |

यज्ञोपवीत (जनेऊ) का भोज

मिथिलांचल में यज्ञोपवीत के अवसर पर होने वाले भोज का आनंद ही कुछ और है | जनेऊ से एक  सप्ताह या दस दिन पहले जिस घर  में  बसकट्टी या उद्दोग  का भोज होता है उपर्युक्त व्यंजन के अलावा बड़ी बनती है | उद्दोग के भोज में बड़ी होना आवश्यक है | बसकट्टी के एक सप्ताह या दस दिन बाद  जनेऊ के दिन से एक दिन पहले कुम्र्म का भोज होता है | इस दिन कुल देवी को छागर का बलिप्रदान दिया  है | शाम में भोज का आयोजन होता है | भोज में प्रसाद के रूप मांस परोसा जाता है |अंत में दही बांटी जाती है | दुसरे दिन अर्थात जनेऊ के दिन यज्ञोपवित संस्कार हो जाने के बाद दही-चुडा का भोज आयोजित होता है | पहले चुडा बांटा जाता है | क हर के बाद दही चीनी | फिर डालना की सब्जी | डालना मिथिला में बनते वाली एक विशेष प्रकार की सब्जी है जिसमे आलू ,बैगन , परवल या गोभी , मटर एवं कदीमा मिलाकर सब्जी बनाया जाता है | आम के समय में आम भी भोज में बांटा जाता है | जो मिठाई का काम करता है |

श्राद्ध भोज

श्राद्ध के अवसर पर आयोजित होने वाले भोज को मिथिलांचल एकादशा एवं द्वादशा का  भोज कहते हैं | प्रथम दिन एकादशाह की भोज एवं दुसरे  दिन द्वादशा की भोज होती है |प्रथम दिन भोज में भात – दाल ,  आलू परबल या आलू गोभी , कदीमा , कद्दू , बैगन अदौड़ी  , साग , ओल की चटनी , आलू एवं कच्चा केला की तरुआ एवं उरीद के बेशन का बड़ होता  है | अंत में दही बांटा जाता है | दुसरे दिन की भोज में चुरा-दही चीनी का भोज होता है | जिसमे डालना की प्रधानता रहती है | लेकिन अब खाद्य पदार्थों में मिलाबट होने के कारण लोग भोज खाने से परहेज करने लगे हैं |

बदल रहा है स्वरुप मिथिला के भोज का भी !

बदलते दौर में भोज का भी स्वरुप मिथिला में बदल रहा है | जहाँ पहले केले के पत्ते बिछाकर ज़मीन पर भोज कराया जाता था अब लोग कुर्सी टेबल लगाकर प्लास्टिक प्लेट्स का इस्तेमाल करने लगें है | विवाहों में शराब परोसने की कुसंस्कृति का जन्म हुआ है | गावों में भोज करने की बजाये कुलीन वर्ग पञ्च सितारा  होटलों में भोज का आयोजन कर रहें हैं | पारंपरिक भोज की जगह बुफ़े सिस्टम ले रहा है |

Author: Team MithilaConnect

Team MithilaConnect provides the information and in depth details about the news , articles and events in Mithila Region of Bihar.
Follow us on Twitter , Like us on FaceBook

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *