‘गंगा नदी से भी ज्यादा पवित्र ‘ गया के फल्गु नदी पर छाया अस्तित्व का संकट

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Phalgu River of Gaya

गया शहर के पूर्वी छोर पर पवित्र फल्गु नदी बहती है. तकरीबन पूरे साल ही लोग अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना लेकर यहां पहुंचते हैं और फल्गु नदी के तट पर पिंडदान और तर्पण करते हैं.

पितृपक्ष के दौरान यहाँ मेला लगा रहता है |हिंदू धर्म में सनातन काल से ‘श्राद्ध’ की परंपरा रही है | कहते हैं कि हर इंसान पर देव ऋण, गुरु ऋण और पितृ (माता-पिता) ऋण होते हैं | पितृऋण से मुक्ति तभी मिलती है, जब माता-पिता के मरणोपरांत पितृपक्ष में उनके लिए विधिवत श्राद्ध किया जाए|

आश्विन कृष्ण पक्ष प्रतिपदा से आश्विन महीने के अमावस्या तक को ‘पितृपक्ष’ या ‘महालया पक्ष’ कहा गया है| मान्यता के अनुसार इस दौरान पिंडदान मोक्ष प्राप्ति का सहज और सरल मार्ग है| पितरों के लिए खास तौर पर पितृपक्ष में मोक्षधाम यानी बिहार के गया आकर पिंडदान और तर्पण करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है और माता-पिता समेत सात पीढ़ियों का उद्धार होता है.

क्या होता है फल्गु नदी तट पर

Pind daan at Phalgu river

पितृपक्ष के दौरान बिहार के गया में मेले का आयोजन किया जाता है. गया को विष्णु का नगर माना गया है. यह मोक्ष की भूमि कहलाती है. विष्णु पुराण और वायु पुराण में भी इसकी चर्चा की गई है. विष्णु पुराण के मुताबिक, गया में पिंडदान करने से पूर्वजों को मोक्ष मिल जाता है और वे स्वर्ग चले जाते हैं.

माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद है, इसलिए इसे ‘पितृ तीर्थ’ भी कहा जाता है. वायुपुराण में तो यहां कि फल्गु नदी की महत्ता का वर्णन किया गया है और इसे गंगा नदी से भी ज्यादा पवित्र माना गया है|

कहा जाता है कि पिंडदान के समय मृतक की आत्मा को अर्पित करने के लिए जौ या चावल के आंटे को गुंथकर बनाई गयी गेंद के समान गोलाकार वस्तु को ही पिंडदान कहते हैं| श्राद्ध की मुख्य विधि में मूल रूप से तीन कार्य होते हैं पिंडदान , तर्पण और ब्राम्हण भोजन|दक्षिण दिशा की ओर घूम कर , आचमन कर , जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखकर चावल , गाय के दूध , घी , शक्कर , एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना ही पिंडदान कहलाता है |

फल्गु नदी का धार्मिक महत्व

Phalgu River Coast

फल्गु नदी का धार्मिक महत्व भी है | तीज-त्योहारों में बड़ी संख्या में लोग फल्गु नदी में स्नान करते थे | प्राचीनकाल में गया के बड़े भूभाग की सिच्चाई की जाती थी | लेकिन अब इस नदी में पानी नहीं है | आमतौर पर बरसात के दिनों में जब उत्तर बिहार के नदियों में बाढ़ आ जाती है उस समय भी यहाँ आने वाले श्रद्धालु नदी की बालू खोदकर पानी निकालते हैं | ऐसे में इस नदी का अस्तित्व ही खतरे में है |  फल्गु नदी का उद्गम स्थल छोटानागपुर का पाठारी भाग है | यह गंगा की सहायक नदी है |

कहते हैं कि माता सीता के श्राप के कारण यह नदी अन्य नदियों के तरह  नहीं बह कर भूमि के अंदर बहती है, इसलिए इसे ‘अंत: सलिला’ कहा जाता है |मान्यता है कि सबसे पहले आदिकाल में जन्मदाता ब्रह्मा और भगवान श्रीराम ने फल्गु नदी में पिंडदान किया था. महाभारत के वनपर्व में भीष्म पितामह और पांडवों द्वारा भी पिंडदान किए जाने का उल्लेख है|

प्रदूषित हो चुकी है नदी

अब फल्गु नदी बहुत ही प्रदूषित हो चुकी है | प्रतिदिन लाखों टन सड़ी-गली वस्तुएं नदी में फेकने और नाली का पानी बहने के कारण इसमें दिनों दिन प्रदुषण बढ़ रहा है | नदी के किनारे पानी इतना गंदा बहता है कि उससे स्नान कर लेने भर से ही कई रोग होने की आशंका बनी रहती है |

इतना ही नहीं मानव उत्सर्जित गंदगी भी नदी में मिल रही है| जिसके कारण प्रदुषण लगातार बढ़ता जा रहा है | खातालों से निकलने वाली गंदगी भी इसी नदी में मिल रही है | यही कारण है कि इस नदी में प्रदुषण दुगुनी तेजी से बढ़ रही है |

Author: Team MithilaConnect

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