क्या कहा था भगवान् राम ने सिमरिया धाम के सन्दर्भ में !

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सिमरिया धाम को हम कल्पवास मेले के रूप में जानते हैं |

इस स्थान के सबसे नजदीक बड़ा स्टेशन बरौनी और बेगुसराय है जहां पर सभी रूटों की मेल एवं एक्सप्रेस गाड़ियां रुकती है | यहाँ से आप टैम्पो , बस एवं अन्य सवारियों से सिमरियाघाट पहुँच सकते हैं |

वैसे सिमरिया घाट के पास ही राजेन्द्र पुल नामक एक छोटा स्टेशन है जहां पर सिर्फ पैसेंजर गाड़ियां ही रुकती है | आसपास के स्थानीय लोग इन्हीं गाड़ियों से यहाँ आकर गंगा स्नान करते हैं |पिछले वर्ष  यहाँ कार्तिक महीने में महाकुम्भ का आयोजन भी हुआ था |

सिमरिया में भी होता था  कुम्भ

जब हम कुम्भ शब्द कि कल्पना करते हैं तो हमारे मन में एक ऐसे क्षेत्र का बोध होता है जहां विशाल जन समुंह उपस्थित होते हैं | साथ ही उपस्थित जन मानस का एक ही उद्देश्य रहता है कि उपलब्ध नदी में स्नान कर अमृत तत्व कि खोज करना |

प्राचीन समय में भारत में १२ स्थानों पर कुम्भ का आयोजन होता था | बिहार प्रांत के बेगूसराय जिले सिमरिया में भी कुम्भ का आयोजन होता था | लेकिन कालान्तर में सिमरिया में कुम्भ की कड़ी टूट गयी | लेकिन कुम्भ के अवशेष के रूप में यहाँ कल्पवास की परम्परा बनी रही |

क्षीर सागर मंथन

Kumbh and Simaria

कुम्भ से सम्बन्धित वैसे कई पौराणिक एवं लोक प्रचलित कथाएँ हैं | लेकिन सबसे पुरानी एवं मान्यता अनुसार सही कथा समुद्र मंथन से जुडी है |

एक बार दुर्बासा महर्षि ने क्रोध में आकर देवराज इंद्र और अन्य देवता को श्राप दे दिया | जिसके कारण इंद्र एवं देवतागण बहुत ही कमजोर हो गये | फलःस्वरुप दैत्यों ने देवताओं पर आक्रमण शुरू कर दिया | दैत्यों से छुटकारा पाने के लिए देवतागण भगवान् विष्णु के पास गये और विनती करने लगे | विष्णु ने देवताओं के कष्ट को समझे और उन्हें दैत्यों के साथ ही मिलकर कार्य करने को कहे |

यह कार्य था क्षीर सागर मंथन का | देवता और दैत्यों ने मिलकर समुद्र मंथन किये | इस समुद्र मंथन से निकला अमृत कुम्भ | देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने अन्य देवताओं के इशारे पर अमृत कलश को लेकर आकाश में उड़ गए | क्योंकि ये अमृत यदि दैत्यों के हाथ लग जाता तो वे और भी शक्ति शाली हो जाते |

लेकिन दैत्यों ने देवताओं के इस चाल को समझ लिया | फिर दत्य गुरु शुक्राचार्य के आदेश पर दैत्यों ने जयंत का पीछा कर उसके हाथ से अमृत लेने का प्रयास किया | लेकिन जयंत आसानी से अमृत दैत्यों के हाथ में अमृत कलश देने वाला नहीं था | परिणामस्वरूप १२ दिनों तक दोनों के बीच युद्ध हुआ |

इस युद्ध में अमृत कलश से चार बूंद पृथ्वी पर गिरी | बांकी आठ बूंद देवलोक मे | पृथ्वी लोक में जिस जिस स्थान पर अमृत का बूंद गिरी वह स्थान है – प्रयाग , हरिद्वार , उज्जैन और नासिक | यही कारण है कि कुम्भ की मेला इसी चार स्थानों पर आयोजित होता है |

देव और दानवों के बीच १२ दिनों तक युद्ध हुआ था | देव लोक का एक दिन पृथ्वी पर एक वर्ष के सामान होता है | इसलिए कुम्भ भी बारह होते हैं , जिनमे से चार पृथ्वी पर होते हैं और बांकी आठ कुम्भ देवलोक में होते हैं | जिसका उल्लेख रुद्रयामल तन्त्र जैसे धर्म ग्रस्न्थों में मिलता है |

विभिन्न जगहों पर कुम्भ समयानुसार आयोजित होता था | जैसे हरिद्वार और उज्जैन में बैसाख महीने में , बद्रीनाथ में ज्येष्ठ्य महीने में , जग्गनाथपुरी और द्वारका में आषाढ़ और श्रावण महीने में , नासिक और रामेश्वरम में भादव और आश्विन में , सिमरिया और कुरुक्षेत्र में कार्तिक और अग्रहण में , गंगासागर और प्रयाग में पौष और माघ माह में |

कुम्भ कोणम और ब्रम्हपुत्र में फाल्गुन और चैत्र माह में कुम्भ का आयोजन होता था | ये आठ स्थल धीरे-धीरे कुम्भ आयोजन से बंचित हो कर देवलोक में आयोजित होने लगे | विलोप होने वाले जगहों में सिमरिया भी एक था |

सिमरिया धाम का बर्णन  

rama_on_simaria

ऋग्वेद में वर्णित तथ्यों से स्पस्ट होता है कि मिथिला की सीमा पर अवस्थित गंगा किनारे सिमरिया धाम है |

सिमरिया धाम का भौगोलिक दिग्दर्शन रुद्रयामल तन्त्र के अम्रितिकरण प्रयोग नामक ग्रन्थ के श्लोक में भी वर्णित है |

तुलसी रामायण के बाल काण्ड के अनुसार भगवान् राम जब विश्वामित्र के साथ जनकपुर जा रहे थे तो विश्वामित्र ने भगवान् राम से रास्ते में कहा कि यह वही देश है जहां समुद्र मंथन किया गया था और समुद्र्मन्थान में सहायक सामग्रियों जैसे मन्दराचल पर्वत , वासुकी नाग , विषपाई , नीलकंठ , कच्छप सिन्धु , सागरमाथा आदि आसपास के इलाकों में मौजूद हैं |

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