क्या विलुप्त हो जायेगा मिथिला में जुड़शीतल पर्व ?

आलेख

मिथिला में जुड़शीतल पर्व बैशाख की पहली तिथि को मनाया जाता है। इसे बासी पर्व भी कहा जाता है।

वैसे तो सम्पूर्ण भारत वर्ष में पर्व त्यौहार मनाये जाते हैं | लेकिन मिथिला में मनाये जाने वाले जितने भी पर्व त्यौहार हैं उसमे जुड़शीतल पर्व की बात ही कुछ और है |

जुड़शीतल से जुडी मान्यताएं

कीचड़ एवं गोबर एक दुसरे पर फेकने की प्रथा जुड़ शीतल के दिन वर्षों से चली आयी है

मिथिला में लोगो का कहना है कि आज के दिन ब्रम्हा जी ने सृष्टि का निर्माण किया था |

इस दिन से ही नए साल की शुरुआत हुई थी | इसलिए इस दिन को नवसम्वत्सर नाम भी रखा गया |

यह पर्व दो दिन तक मनाया जाता है |पहले दिन, मेष संक्रांति को मिथिलावासी “सतुआइन’’ पर्व मनाते हैं , तथा दुसरे दिन को “धुरखेल” के रूप में मनाते हैं |

सतुआइन के दिन  सुबह में लोग गुड़ या चीनी , चने की सत्तू में मिला कर नास्ता करते हैं |

महान गणितग्य भास्कराचार्य  द्वारा पंचांग की रचना

महान गणितग्य भास्कराचार्य ने जुड़शीतल के दिन से ही पंचांग की रचना की थी |

महान गणितग्य भास्कराचार्य ने जुड़शीतल के दिन से ही सूर्योदय एवं सूर्यास्त तक दिन , महीना एवं वर्ष की गणना करते हुए पंचांग की रचना की थी |

इस दिन ग्रामीण क्षेत्र की  बुजुर्ग महिलायें  भगवती को  सत्तू की भोग लगाती हैं एवं जल भरा घैला दान करती हैं |

रात में लोग बड़ी-भात , दाल की पूड़ी , सोहिजन  की सब्जी भोजन करते हैं , आम की चटनी होना अनिवार्य हैं | इस पर्व की एक ख़ास विशेषता यह है कि बासी भात भी भगवती को भोग लगाया जाता है |

मिथिला में  जुड़शीतल

जुडी सीतल में नौजवान एवं बच्चे बांस की पिचकारी बना कर उस पिचकारी से पानी उड़ेलते थे

दुसरी ओर सतुआइन पर्व का वैज्ञानिक महत्व भी है | इस मौके पर मिथिलांचल में जौ की सत्तू खाने की परम्परा है |

एक समय था जब जुड़ शीतल नाम से प्रसिद्ध मिथिला का यह पर्व धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ कई को समेटने में सक्षम था | परन्तु आज यह पर्व खुद अपनी अस्तित्व को भी नहीं सहेज पा रहा हैं | मिथिलांचलवासी इस पर्व को अन्य परम्पराओं की तरह भूलते जा रहे हैं | पहले मिथिलांचल में १०-१५ दिन पहले से ही लोग जुड़शीतल पर्व मनाने  लगते थे |

नौजवान एवं बच्चे हाथ से बांस की पिचकारी बना कर तालाब में जा कर एक दुसरे पर उस पिचकारी  से पानी उड़ेलते थे  | बड़े बुजुर्ग अपने घरों के आसपास की कीचड़ की सफाई , तालाबों एवं कुओं की उड़ाही खेल-खेल में ही कर लेते थे | कीचड़ एवं गोबर एक दुसरे पर फेकने की प्रथा जुड़ शीतल के दिन वर्षों से चली आयी है | गाँव की औरतें भी इस खेल में बढ़ चढ़ कर भाग लेती थी |

प्राक्रतिक चिकित्सा के दृष्टीकोण से जुड़शीतल

प्राक्रतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से भी जुड़शीतल पर्व महत्वपूर्ण माना जाता है | क्योंकि यह समय गर्मी का होता है तथा इस मौसम में लोग सबसे अधिक वायु पित्त रोग से ग्रसित हो जाते हैं | वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जौ एवं चना को शीतल एवं वायुरोधक माना गया है | इसलिए लोग वैसाख महीने के प्रथम दिन ही इसका सेवन करते हैं |

जुड़शीतल के दिन सूर्योदय से पहले ही घर की बुजुर्ग महिला के द्वारा घर के सभी सदस्यों के माथे को जल से शिक्त किया जाता है | जिसे जुड़ाया जाना कहा जाता है | विभिन्न ग्रंथों में भी इसकी चर्चा है |इस परम्परा को निभाने के बाद हर कोई पेड़- पोधों को भी जल से जुड़ाते हैं |

विलुप्त होने की कगार पर है जुड़शीतल

जंगलों के विलुप्त होने से जुडी सीतल में शिकार की परंपरा अब समाप्त हो चुकी है

शहरी क्षेत्र में तो जुड़शीतल पर्व विलुप्त ही हो गया है | इक्का दुक्का घरों में ही इस पर्व को विधिवत मनाया जाता है | सतुआइन के दिन जो घर में व्यंजन एवं भोजन बनता है वही भोजन जुड़शीतल के दिन खाते हैं |

मिथिलांचल में बड़े बुजुर्गों का कहना है कि जुड़शीतल के दिन , कीचड़- मिट्टी खेलने के बाद लोग नहा-धो कर घर में बने अति विशिष्ट भोजन करते थे

फिर दोपहर २ बजे झुण्ड में लाठी , भाला , फरसा , बरछी आदि लेकर शिकार खेलने जाते थे | शिकार में शाही , खरगोश आदि खाद्य पशुओं एवं पक्षियों की होती थी |

शिकार करना शुभ माना जाता था और शिकार में असफल होने पर अशुभ माना जाता था | कहीं – कही  तो दंगल कुश्ती का भी आयोजन होता था | शाम होते ही लोग भांग और शरबत पी कर मदमस्त हो जाते थे |

लेकिन ये परम्पराएं आज बिलुप्त हो गयीं हैं |

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