दरभंगा में है मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फर के पोते की कब्र !

आलेख
बिहार के दरभंगा में अंतिम मुग़ल वारिस जुबैरुद्दीन गोरगन की कब्र

हर मौत को शोहरत नसीब नहीं ,
कुछ किरदार गुमनामी में दम तोड़ देतें है

लगता है मानो ये शेर मुगल सल्तनत के अंतिम बादशाह बहादुर शाह जफर के पोते जुबैरुद्दीन गोरगन के जीवन को बयां करते हों|

बिहार के पटना से लगभग 140 किलोमीटर दूर दरभंगा शहर के दिग्घी तालाब के किनारे एक पुराना और खंडहर हो चुका मकबरा है , आम लोगो की नज़रों से लगभग अनजान और ओझल!

यह मकबरा किसी आम शख्स का नहीं है , ये है हिंदुस्तान के अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह जफर के पोते और मुग़लिया सल्तनत के अंतिम वारिस जुबैरुद्दीन गोरगन का |

कौन थे ज़ुबैरुद्दीन गोरगन ?

भटियारी सराय रोड के इस दरगाह शरीफ के अहाते में है ये मकबरा

अपने दादा , बहादुरशाह जफर के सबसे बड़े पुत्र के ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते गोरगन दिल्ली की तख़्त के स्वाभाविक वारिस थे |पर एक दुर्भाग्य ने उन्हें ताज से दूर, दरभंगा पंहुचा दिया | शहजादा जुबैरुद्दीन बहादुरशाह जफर के प्रथम पुत्र मिर्जा दारा बख्त के पुत्र थे|

हिंदुस्तान को अपना वतन मानने वाले बहादुर शाह ज़फर की सरपरस्ती में प्रथम स्वतंत्रता आन्दोलन शुरू हो गया | पर अंग्रेजों ने 1857 की क्रांति को बेरहमी से कुचल दिया था |

मुगल सल्तनत के अंतिम बादशाह कैद कर लिए गए| बाद में उन्हें बर्मा भेज दिया गया | फिर यातनाओं और दमन का एक लम्बा दौर चला , जिसमे अंग्रेजों ने बहादुर शाह ज़फर के पुत्रों का भी क़त्ल कर दिया गया |

उनके परिवार में बच गए सिर्फ उनके पोते शहजादे जुबैरुद्दीन| उन्हें भी अंग्रेजों ने दिल्ली से बेदख़ल कर दिया था |अंग्रेजो हुकूमत के क्रूर फरमान के मुताबिक पूरे हिन्दुस्तान में वह किसी भी जगह तीन साल ज्यादा नहीं रह सकते | अब जुबैरुद्दीन का जीवन खानाबदोश सा हो गया था | वह समस्त भारत वर्ष में भटकने लगे |

कैसे ज़ुबैरुद्दीन गोरगन पहुचें दरभंगा ?

लाल पत्थरों से बना है बहादुर शाह ज़फर के पोते का मकबरा

जुबैरुद्दीन का काशी में तीन साल का समय पूरा हो चुका था | वह अगले निर्वास स्थान के लिए बहुत ही चिंतित थे| इसी निर्वासित जीवन के क्रम में दरभंगा के तत्कालीन महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह की जुबैरुद्दीन से काशी में मुलाक़ात हुई|

महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को ज्ञात था कि अगर 1857 की क्रान्ति सफल हो जाती तो जुबैरुद्दीन ही हिन्दुस्ता के बादशाह होते| ऐसे में मुग़ल वारिस की हालत देखकर वे बड़े दुखी हुए क्योकि दरभंगा राज के संस्थापक महेश ठाकुर को दरभंगा की ज़मींदारी जुबैरुद्दीन के पूर्वज बादशाह अकबर से ही प्राप्त हुई थी | स्वाभाविक रूप से महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह मुगल सल्तनत के कृतग्य थे|

दरभंगा महाराज के राज अतिथि

दरभंगा महाराज ने उनसे दरभंगा चलने का आग्रह किया  और 17 मार्च 1881 को मुग़ल खानदान के अंतिम वारिस जुबैरुद्दीन परिवार सहित दरभंगा आ गए|  जुबैरुद्दीन को दरभंगा महाराज ने राज अतिथि की दर्जा दिया | उनके लिए भत्ते और नौकरों की व्यवस्था की गयी |

अंग्रेजो का दरभंगा राज पर दबाव

अंग्रेजों ने मुग़ल वारिस को शरण देने के लिए लक्ष्मीश्वर सिंह को कुपरिणाम भुगतने की धमकी दी उनसे उपाधियाँ वापस लेने तक की धमकी दी , लेकिन उन्होंने अंग्रेजों की एक भी बात नहीं मानी और कहा कि जिसने हमें यह सूबेदारी दी अगर वही नहीं बचेगा तो राज किस काम का |

अंग्रेजो के दबाव को ना मानते हुए जुबैरुद्दीन दरभंगा के राज अतिथि बनाए गये | अपनी विलक्षण
कूटनीति  से लक्ष्मीश्वर सिंह ने अंग्रेजों द्वारा जुबैरुद्दीन पर लगे हुए एक ही जगह तीन साल से अधिक नहीं रहने का आदेश भी रद्द करवा लिया  | इस प्रकार जुबैरुद्दीन दरभंगा में ही स्थायी रूप से बस गए |

लक्ष्मीश्वर सिंह के मरणोपरांत उनके पुत्र महाराज रामेश्वर सिंह ने जुबैरुद्दीन की आतिथ्य परम्परा को जारी रखा |

हाल की तस्वीरों में अभी की स्थिति का अंदाज़ा आप लगा सकतें हैं

जुबैरुद्दीन थे अपने दादा की तरह कला प्रेमी

बहादुरशाह जफर एक बेहतरीन शायर भी थे |अपने दादा बहादुरशाह जफर की तरह जुबैरुद्दीन की भी लेखन में रुचि थी |

नहीं सुखद रहा दरभंगा आगमन

दरभंगा आगमन भी शायद गोरगन के नसीब को रास नहीं आया | आगमन के दो साल बाद ही 1883 में उनके एकमात्र पुत्र का कोलेरा से निधन हो गया | अगले ही साल उनकी पत्नी मेहरू निस्सा भी चल बसीं| इन सदमों के कारण गोरगन वापस चले जाना चाहते थे पर दरभंगा महाराज ने उन्हें सांत्वना दी और रहने को मना लिया |

लेखन और शायरी

दरभंगा रहने के दौरान उन्होंने कुल छह किताबें लिखी जिसमे से ऐतिहासिक किताब मौज-ए-सुल्तानी काफ़ी चर्चित रही | मौज-ए-मुल्तानी पुस्तक में देश के विभिन्न रियासतों की शासन व्यवस्था का जिक्र किया है|

जुबैरुद्दीन द्वारा लिखी गयी पुस्तक चमनिस्तान- ए – सुखन एक शायरी संग्रह है जबकि मशनवी-दूर- ए- सहसबार महाकाब्य है | इसी तरह मशनवी-दूर-ए- सहसबार  में दरभंगा राज परिवार और मिथिला की संस्कृति  के बारे में जिक्र की है |

अंतिम वक़्त

तनहा और ग़मज़दा गोरगन ने अपने प्रियजनों की मृत्यु के बाद, अपने आप को शायरी और लेखन में डूबा लिया था | वे अपने आखिरी वक़्त तक लेखन कार्य में लगे रहे | 1905 में उनके निधन के बाद तब के दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह ने एक मकबरा बनवा दिया|

यह नियति का खेल ही था की जिस लाल पत्थरों से निर्मित लाल किले से कभी मुग़ल बादशाह हिंदुस्तान की तकदीर लिखते थे उन्ही जैसे लाल पत्थरों से निर्मित इस मकबरे में अंतिम मुग़ल वारिस खामोश दफ़न हैं |

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